अर्घ्य सेनगुप्ता और स्वप्निल त्रिपाठी का कॉलम:न्यायाधीश को सियासी दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति ठीक नहीं

Apr 30, 2026 - 06:09
अर्घ्य सेनगुप्ता और स्वप्निल त्रिपाठी का कॉलम:न्यायाधीश को सियासी दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति ठीक नहीं
इस वर्ष की शुरुआत में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को शराब नीति मामले में ट्रायल कोर्ट ने इस आधार पर आरोपमुक्त कर दिया कि उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है। इस फैसले को सीबीआई ने दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान मामले ने तब अप्रत्याशित मोड़ लिया, जब केजरीवाल ने एक आवेदन दायर कर यह मांग की कि सुनवाई कर रही जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा इस मामले से स्वयं को अलग कर लें, क्योंकि उन्हें पक्षपात की आशंका है। यद्यपि इस आवेदन को खारिज कर दिया गया, लेकिन यह घटना एक परिचित प्रश्न को फिर सामने लाती है- आखिर किसी जज को कब किसी मामले की सुनवाई से अलग होना चाहिए? भारत में रीक्यूजल (स्वयं को अलग करने) का कानून अपेक्षाकृत स्पष्ट है, भले ही उसके प्रयोग पर अकसर बहस होती रहती हो। इसका मूल परीक्षण यह है कि क्या एक सामान्य, समझदार व्यक्ति के मन में पक्षपात की आशंका उत्पन्न होती है। यह कोई हल्का मानदंड नहीं है। अदालतों ने लगातार यह कहा है कि ऐसी आशंका ठोस तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल अस्पष्ट संदेह या राजनीतिक असहमति पर। समय के साथ कुछ सीमित और स्पष्ट आधार विकसित हुए हैं- जैसे आर्थिक हित, उसी मामले में पूर्व भागीदारी, या किसी पक्ष के साथ निकट व्यक्तिगत संबंध। इनसे परे, विशेषकर वैचारिक या संस्थागत पक्षपात के आरोपों में, मापदंड काफी ऊंचा होता है। अकसर देखा गया है कि उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लेते हैं। गुजरात और इलाहाबाद उच्च न्यायालयों में राहुल गांधी से जुड़े कई मामलों में न्यायाधीशों ने बिना कारण बताए स्वयं को अलग किया है। कई बार इसे न्यायाधीश का अपने दायित्व से विमुख होना भी माना गया। लेकिन केजरीवाल के मामले में स्थिति उलट थी। यहां न्यायाधीश सुनवाई के लिए तैयार थे, परंतु पक्षकार को आपत्ति थी। रीक्यूजल आवेदन में कई आधार प्रस्तुत किए गए- जैसे न्यायाधीश द्वारा पहले दिए गए आदेश, कुछ तकनीकी आपत्तियां और न्यायाधीश के परिजनों का सरकारी पेनलों में शामिल होना। अदालत ने इन तर्कों को इस आधार पर खारिज कर दिया कि वे पक्षपात की आशंका स्थापित नहीं करते। अदालत का यह निर्णय उचित था- किसी भी न्यायिक निर्णय में एक पक्ष संतुष्ट होगा और दूसरा असंतुष्ट। हारने वाला पक्ष यह तय नहीं कर सकता कि वह उसी न्यायाधीश के सामने पेश नहीं होगा। यही बात न्यायाधीश के परिजनों के पेशेवर जीवन पर भी लागू होती है। सबसे विवादास्पद तर्क वैचारिक निकटता से जुड़ा था। यह कहा गया कि जस्टिस शर्मा ने अधिवक्ता परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भाग लिया है, जो एक ऐसा संगठन है, जिसकी वैचारिक दिशा याचिकाकर्ता और उनकी राजनीतिक पार्टी के विपरीत है। भारत में संवैधानिक परंपरा ने कभी भी केवल वैचारिक या राजनीतिक संबद्धता को रीक्यूजल का आधार नहीं माना है। इस संदर्भ में जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर का उदाहरण महत्वपूर्ण है। सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति से पहले वे कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े रहे थे और केरल सरकार में कानून मंत्री भी थे। उस समय यह आशंका जताई गई थी कि उनकी विचारधारा उनके निर्णयों को प्रभावित कर सकती है। लेकिन उनके कार्यकाल ने सिद्ध किया कि पूर्व वैचारिक जुड़ाव अपने आप में न्यायिक पक्षपात में परिवर्तित नहीं होता। उन्होंने मजदूरों, कैदियों, महिलाओं और बच्चों जैसे वंचित वर्गों के अधिकारों पर कई प्रगतिशील फैसले दिए। इससे यह सिद्धांत और मजबूत होता है कि जज बनने के बाद न्यायाधीश कानून से बंधा होता है। यही सिद्धांत उन आरोपों पर भी लागू होता है जो सार्वजनिक मंचों में भागीदारी के आधार पर लगाए जाते हैं। केवल इस आधार पर कि किसी न्यायाधीश ने किसी विशेष संगठन के कार्यक्रम में भाग लिया है- जो कि न्यायिक समुदाय में असामान्य नहीं है- पक्षपात की उचित आशंका नहीं मानी जा सकती। इसके लिए यह दिखाना आवश्यक है कि उस भागीदारी और विवादित मामले के बीच कोई स्पष्ट और प्रत्यक्ष संबंध है। यदि सामान्य वैचारिक जुड़ाव ही रीक्यूजल का आधार बन जाए, तो संवैधानिक निर्णय असम्भव हो जाएंगे। यह घटना न्यायपालिका को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने की बढ़ती प्रवृत्ति को भी दर्शाती है। राजनीतिक मुद्दों पर संघर्ष सड़कों और संसद में होना चाहिए, अदालतों में नहीं। पक्षकारों को समझना चाहिए कि बार-बार रीक्यूजल की मांग न्याय प्रणाली को प्रभावित करती है। वहीं न्यायाधीशों को भी अब अपने शब्दों और आचरण के प्रति जिम्मेदार रहना होगा। (ये लेखकों के अपने विचार हैं)