आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम:भारत के राजनीतिक जीवन में विविधता आज भी अहम है

May 14, 2026 - 06:05
आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम:भारत के राजनीतिक जीवन में विविधता आज भी अहम है
2027 में सात विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिनमें यूपी, गुजरात और पंजाब शामिल हैं। अगर हाल में हुए चुनावों से कुछ सीख मिलती है, तो वह अगले साल के चुनावों में ज्यादा काम आएगी, न कि 2029 के राष्ट्रीय चुनावों में। वैसे भी राज्यों के चुनाव और राष्ट्रीय चुनाव अलग होते हैं। तो हमने क्या सीखा? सबसे पहली बात तो यही कि बड़े निहितार्थ चाहे जो रहे हों, 2029 के लोकसभा चुनाव का नतीजा अभी से तय नहीं हो गया है। साथ ही हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हाल के चुनाव फिर से यह दिखाते हैं कि भारत चुनावी तानाशाही नहीं है। वी-डेम रिपोर्ट- जो दुनिया में लोकतंत्र पर सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली रिपोर्ट है- कई सालों से ऐसा कहती रही है। अगर चुनावों में इतने राज्यों की सरकारें बदल रही हैं तो यह साफ है कि भारत का चुनावी लोकतंत्र अभी भी काफी मजबूत है। सत्तारूढ़ सरकारों का बदलना ही चुनावी तानाशाही के विचार का सबसे अच्छा जवाब है। लेकिन अगर एसआईआर आने वाले चुनावों के लिए एक मॉडल बन जाता है, तो भारत का लोकतंत्र जरूर कमजोर होगा। मुस्लिम वोटर्स- जिनका भाजपा के लिए वोट प्रतिशत 2014 से करीब 8% के आसपास ही रहा है- उन्हें ज्यादा संख्या में हटाकर एसआईआर ने चुनावी मुकाबले को प्रभावित करने की कोशिश की है। अमेरिका में भी ऐसा होता है, जहां रिपब्लिकन सरकारें "जेरिमैंडरिंग' करती हैं। इससे अश्वेत वोटर्स का असर कम हो जाता है, क्योंकि वे आमतौर पर रिपब्लिकन को बहुत कम वोट देते हैं। असम में भी अलग तरीके से ऐसा ही हुआ, जहां अल्पसंख्यक बहुल सीटें 30 से घटकर 20 के आसपास रह गईं। सत्ता में बने रहने के लिए कई आधुनिक सरकारें ऐसे तरीके अपनाती हैं। लेकिन कभी-कभी ये तरीके फेल भी हो जाते हैं, जैसे हंगरी में विक्टर ऑर्बन की हार। लेकिन ऐसा तब होता है, जब विरोधियों की जीत इतनी बड़ी हो कि ये सारे तरीके बेअसर हो जाएं। कह लीजिए कि बंगाल में भाजपा की जीत में एसआईआर का योगदान उतना ही था, जिसे शेक्सपीयर के शब्दों में "जीत की सुरक्षा को और पक्का करना' कह सकते हैं। दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी अ​ब दक्षिण के 5 में से 3 राज्यों में सरकार चला रही है : कर्नाटक, तेलंगाना और केरल। आज इसे मुख्य रूप से दक्षिण की पार्टी कहा जा सकता है। उत्तर और पश्चिम में भी इसकी मौजूदगी है, लेकिन वहां यह बार-बार हार रही है। यह दो उत्तरी राज्यों (हिमाचल प्रदेश और झारखंड) में भी या तो सरकार में है या उसका हिस्सा है, लेकिन ये छोटे राज्य हैं। इस वक्त, कांग्रेस उत्तर और पश्चिम में किसी बड़े राज्य की सरकार नहीं चला रही है। कांग्रेस की साउथ में मजबूत पकड़ के कुछ परस्पर विरोधी असर भी हैं। दक्षिण भारत की अर्थव्यवस्था 2000 से, या उससे पहले से, बहुत तेजी से बढ़ रही है- लगभग चीन जैसी रफ्तार से। इसका मतलब है कि कांग्रेस के पास फंड की कमी नहीं होगी। लेकिन सिर्फ दक्षिण पर आधारित रहकर वह दिल्ली में बड़ी ताकत नहीं बन सकती, क्योंकि संसद की केवल एक-चौथाई सीटें ही दक्षिण में हैं। राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत बनने के लिए कांग्रेस को उत्तर और पश्चिम में बेहतर रणनीति बनानी होगी। साथ ही यह भी देखें कि तमिलनाडु में विजय की जीत काफी अहम है। उनके पिता ईसाई हैं और मां हिंदू। भले ही वे खुद धार्मिक रूप से एक्टिव न हों, पर जन्म से वे एक ईसाई के रूप में रजिस्टर हैं। अलबत्ता तमिलनाडु के वोटर्स के लिए यह कोई मुद्दा नहीं था। वहां राजनीति धर्म से ज्यादा जाति और भाषा पर आधारित है। यही वजह है कि भाजपा की अल्पसंख्यक विरोधी राजनीति विजय के खिलाफ कोई बड़ा माहौल नहीं बना सकी। भाजपा को खुद भी तमिलनाडु में ज्यादा चुनावी फायदा नहीं मिला। यह दिखाता है कि भारत के सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन में विविधता आज भी बहुत अहम बनी हुई है। तमिलनाडु के चुनाव नतीजे पश्चिम बंगाल और असम से काफी अलग हैं। भाजपा हमेशा यह मानती रही है कि भारत की इतनी बड़ी सामाजिक विविधता राष्ट्रीय एकता के लिए समस्या है और इसे "एक देश, एक पहचान' जैसे मॉडल में ढाला जा सकता है, जैसा कि पश्चिमी यूरोप में हुआ है। लेकिन भारत के संस्थापकों का नजरिया इससे अलग था। तमिलनाडु के लोग भी उसी पुराने संवैधानिक नजरिए से सहमत मालूम होते हैं, न कि हिन्दू राष्ट्रवादी विचार से। भारतीय राजनीति के विरोधाभास स्पष्ट हैं। एक तरफ लोकतंत्र की जीत हो रही है, दूसरी तरफ लोकतांत्रिक मैदान को छोटा करने की कोशिश होती है। एक जगह धार्मिक विविधता है, तो दूसरी जगह उस पर हमला भी सफल रहता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)