एन. रघुरामन का कॉलम:अपने वयस्क बच्चे को आप क्या देना चाहते हैं– सीख या लग्जरी

Apr 25, 2026 - 06:09
एन. रघुरामन का कॉलम:अपने वयस्क बच्चे को आप क्या देना चाहते हैं– सीख या लग्जरी
यह 1978 का साल था। भारत के अंधेरे सिनेमाघरों में ‘डॉन’, ‘त्रिशूल’ और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में ‘एंग्री यंग मैन’ अमिताभ बच्चन छाए हुए थे। लेकिन 18.5 वर्ष की उम्र में मेरे लिए असली ड्रामा सिल्वर स्क्रीन पर नहीं, घर के ड्रॉइंग रूम में चल रहा था। पहली सैलरी मिलने के सिर्फ दो दिन बाद पिताजी ने मुझे पास बैठाया। कोई जश्नभरा माहौल नहीं था। उन्होंने कहा, ‘अब परिवार की जिम्मेदारी तुम्हारी है। मुझे तुम्हारी बहन की शादी के लिए बचत पर ध्यान देना है।’ बस, तभी मेरा मुंबई लोकल का फर्स्ट क्लास क्वाटरली पास और नई चमकदार घड़ी लेने का सपना टूट गया। मेरा वो ‘ब्लॉकबस्टर’ साल टूटे सामानों की मरम्मत, किराए का घर पेंट कराने और उसे सही करने में गुजर गया। पिताजी का मंत्र था- ‘तुम्हारी सैलरी, तुम ही मालिक।’ तब मुझे यह वजन जैसा लगा, लेकिन पांच दशक बाद जब अतीत में झांकता हूं तो लगता है वह बोझ असल में बेहतरीन सीख थी। उन्होंने मुझसे अपने पैसे के साथ गलतियां करवा कर मुझमें आर्थिक समझ पैदा की। दो साल के बाद मैंने न सिर्फ फिल्में देखीं, बल्कि जिम्मेदारियां शुरू होने से पहले ही मैं हर रुपए की कीमत भी समझ चुका था। अब हम वर्तमान में आते हैं और जयपुर की बात करते हैं। वहां की एक मां ने मुझे लिखा कि घर में जारी टकरावों से उनका मन भारी है। उनके पति चाहते हैं कि एक माह पहले ही अपनी पहली नौकरी शुरू करने वाला उनका 18 साल का बेटा घर का किराया दे और बिजली व इंटरनेट ​के बिल शेयर करे। वह पूछती हैं, ‘क्या हम लालची नहीं हो रहे? आजकल बच्चे 25 की उम्र तक तो स्कूल में पढ़ते हैं। क्या हमें कुछ वक्त उन्हें जिंदगी सेलेब्रेट नहीं करने देनी चाहिए?’ यह पालन-पोषण और समर्थ बनाने के बीच एक पुरानी कशमकश है। मां को बेटा दिखता है, जिसे पहली कमाई का आनंद लेने के लिए ‘हनीमून फेज’ मिलना चाहिए। जबकि पिता उसे वयस्क मानते हैं, जिसे समझना चाहिए कि ‘इंटरनेट’ फ्री सुविधा नहीं, बल्कि बजट का हिस्सा है। मैंने उन्हें लिखा, ‘मुझे यकीन है कि आपके पति का बचपन कठिन नहीं रहा होगा और न वे लालची परिवार से हैं। जरूर वे बेटे को बजट प्रबंधन का कीमती अनुभव देना चाहते हैं। न सिर्फ उसकी इच्छाओं के लिए, बल्कि बिल चुकाने के लिए भी, जो वयस्क जीवन की जिम्मेदारी है। सुरक्षित तरीके से ऐसी जटिलताओं को समझाने से न सिर्फ आपके बेटे को बजटिंग, बल्कि विविध वित्तीय जिम्मेदारियों को ध्यान रखने और पूरी करने का अनुभव भी मिलेगा। सोचिए, यदि वह भुगतान में देर करता है तो परिणाम वैसे नहीं होंगे, जैसे असली बिल मिस करने पर होते हैं। वहां तो मोबाइल के मामले में भारी जुर्माना लगेगा या बिजली जैसे मामले में सेवा बंद हो जाएगी। धीरे-धीरे दिया गया ऐसा अनुभव युवाओं को सपोर्टिव रहते हुए भविष्य के लिए प्रशिक्षित करने जैसा है। मेरी यही सलाह है कि आप तीनों में यह बातचीत सजा की तरह नहीं, सहयोग भाव से हो। मनी साइकोथेरेपिस्ट और फैमिली एक्सपर्ट्स भी ‘लग्जरी’ के बजाय ‘सीख’ देने के पक्ष में होते हैं। उनका सुझाव है कि कमाऊ वयस्क से कॉन्ट्रिब्यूशन लेने का मतलब यह नहीं कि पैरेंट्स को पैसा चाहिए, बल्कि यह वित्तीय समझदारी का मामला है। कई पैरेंट्स किराया लेते हैं, लेकिन उस पैसे को सेविंग अकाउंट या फिक्स्ड डिपॉजिट में जमा करते हैं। आगे जाकर जब बच्चा अलग घर बनाता है तो वही किराया उसे सरप्राइज डाउन पेमेंट या इमरजेंसी फंड के तौर पर लौटा देते हैं। 1978 में मैंने ‘कसमे-वादे’ फिल्म का पहला शो इसलिए मिस किया, क्योंकि मैं कुर्सी ठीक कर रहा था। आज जयपुर का वह बेटा शायद वीकेंड आउटिंग मिस करे, क्योंकि वह वाई-फाई बिल दे रहा है। फंडा यह है कि पैरेंट्स अपने बच्चे को जो बेहतरीन ‘सेलिब्रेशन’ दे सकते हैं, वो मुफ्त की सुविधाएं नहीं, बल्कि वह भरोसा है, जिससे वह अपनी जिंदगी अपने दम पर जी सके।