एन. रघुरामन का कॉलम:‘फ्यूलिंग स्टेशनों’ को बचाने से इंसानों का भोजन भी बचेगा

Jun 22, 2026 - 06:04
एन. रघुरामन का कॉलम:‘फ्यूलिंग स्टेशनों’ को बचाने से इंसानों का भोजन भी बचेगा
हममें से ज्यादातर लोग एक बार में 5 किमी से ज्यादा नहीं चल सकते। फिर भी, हम 42 किमी मैराथन दौड़ने वालों को विस्मय से देखते हैं। लेकिन वे भी हर 5 किलोमीटर पर बने फ्यूलिंग स्टेशन के बगैर नहीं दौड़ सकते, जबकि उन्हें वहां ठहरने के लिए कोई नियम बाध्य नहीं करता। आयोजक ये स्टेशन इसलिए बनाते हैं, क्योंकि रनर्स के शरीर से पसीने के जरिए बहुत पानी और सोडियम निकल जाता है। उन्हें हर घंटे 60-90 ग्राम कार्बोहाइड्रेट (जेल, स्पोर्ट्स ड्रिंक या फलों ) चाहिए, ताकि उनकी ऊर्जा पूरी तरह खत्म न हो। फ्लुइड स्टेशन कार्डियोवैस्कुलर स्ट्रेन और ओवरहीटिंग से बचाते हैं, जबकि इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक शरीर में पानी बनाए रखने और गंभीर क्रैंम्पिंग को रोकने में मदद करते हैं। अब क्या कोई हर साल 30 हजार किमी से ज्यादा यात्रा की कल्पना कर सकता है? आर्कटिक टर्न ऐसा करते हैं। तकनीकी रूप से वे चलते नहीं, उड़ते हैं। वे ‘चैंपियन ऑफ माइग्रेशन’ के नाम से विख्यात हैं। इन पक्षियों का वजन 100 ग्राम से थोड़ा ज्यादा होता है, फिर भी वे हर साल उत्तरी से दक्षिणी ध्रुव तक माइग्रेट करते हैं। आर्कटिक टर्न सालाना 90 हजार किमी की राउंड ट्रिप करते हैं। हालांकि वे मछली पकड़ने और आराम के लिए ठहरते भी हैं। बिना रुके सबसे लंबी उड़ान का रिकॉर्ड बार-टेल्ड गॉडविट पक्षी (लिमोसा लैपॉनिका) के नाम है, जिसने अक्टूबर 2022 में अलास्का से तस्मानिया तक 13560 किमी की दूरी 11 दिनों में बिना जमीन पर उतरे तय की थी। वे ऐसा कैसे करते हैं? प्रवासी पक्षी इंसानों की तरह नहीं थकते, क्योंकि उन्होंने असाधारण फ्यूल सिस्टम विकसित किया है। उड़ान से पहले उनका वजन 50-100% तक बढ़ जाता है। वे कार्बोहाइड्रेट की जगह फैट बर्न करते हैं, जो प्रति ग्राम दोगुनी से ज्यादा ऊर्जा देता है। वजन कम रखने के लिए गैर-जरूरी अंगों को छोटा कर लेते हैं और आसानी से उड़ने के लिए ऊपर उठती गर्म हवाओं की धाराओं का सहारा लेते हैं। फिर भी उन्हें फ्यूलिंग स्टेशन की जरूरत पड़ती है, जिन्हें प्रकृति ने भरपूर उपलब्ध कराया है। जब वे री-फ्यूलिंग के लिए रुकते हैं तो मानव प्रजाति की बेहतरी के लिए बड़ा काम करते हैं। वे खेती की रक्षा करने वाले एजेंट के जैसे काम करते हैं और रोज लाखों कीड़े खाकर रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल घटाते हैं। फसल खाने वाले बीटल्स और इल्लियों को खाकर वे किसानों को लाखों रुपए के संभावित नुकसान से बचाते हैं। मुझे उनकी मानवता की यह सेवा तब याद आई जब मैंने पढ़ा कि गुजरात वन विभाग अहमदाबाद से सुरेन्द्रनगर जिले तक फैली नलसरोवर बर्ड सेंचुरी में हाई-पावर सोलर फ्लडलाइटें लगा रहा है। शिकार पर रोक के इरादे से उठाए गए इस कदम ने संरक्षणवादियों और पक्षी विज्ञानियों की चिंता बढ़ा दी है। उन्हें डर है कि कृत्रिम रोशनी पक्षियों का व्यवहार प्रभावित करेगी और प्रवासी प्रजातियां वहां से दूर हो जाएंगी। विशेषज्ञों का दावा है कि इससे उनका फीडिंग पैटर्न बिगड़ेगा, तनाव बढ़ेगा, दिशा पहचानने में समस्या होगी और उनके आवासों की गुणवत्ता घटेगी। संरक्षणवादियों का कहना है, वन अधिकारियों को लगता है कि ‘रोशनी से अवैध गतिविधियों पर नजर रखने में मदद मिलेगी, लेकिन पानी पर रोशनी की चमक पक्षियों को परेशान करेगी। कई प्रजातियां सेंचुरी से जा सकती हैं और कभी वापस नहीं आएंगी। वेटलैंड में रोशनी करने के बजाय अधिकारियों को स्टाफ और रात की गश्त बढ़ानी चाहिए।’ शिकारियों से बचने के लिए सॉन्गबर्ड पक्षी भी रात के वक्त झुंडों में प्रवास करते हैं तो ये रोशनी उन्हें भी भ्रमित कर सकती है। पक्षियों का प्रवास महज बायोलॉजिकल वंडर नहीं, बल्कि इको-सिस्टम नवीनीकरण के वैश्विक चक्र का महत्वपूर्ण अंग भी है। इसके बिना वैश्विक जैव विविधता नष्ट हो जाएगी। बाघ जैसी धारियों वाले सॉन्गबर्ड की सोचिए, जिसका वजन 13 ग्राम से ज्यादा नहीं होता, लेकिन 8000 किमी की यात्रा करता है। बदले में उसे ऐसी चीज खाने का मौका मिलता है, जिन्हें उत्साही प्रकृति प्रेमी भी नापसंद करते हैं- कीड़े, जो अन्यथा हमारी फसल चट कर जाएंगे। दुनिया भर में पक्षी संकट में हैं। अमेजन बेसिन से आर्कटिक टुंड्रा तक कीड़ों की संख्या भी घट रही है। इससे इन पक्षियों के लिए बहुत कम जगहें बची हैं, जहां उन्हें आराम, भोजन और घोंसला बनाने का स्थान मिलता है। फंडा यह है कि अगर हम बढ़ती इंसानी आबादी के लिए खाद्य आपूर्ति सुरक्षित रखना चाहते हैं तो हमें प्रवासी पक्षियों के लिए अधिक फ्यूलिंग स्टेशन (यानी जंगल और वेटलैंड) बचाने और बनाने होंगे, ताकि वे कीड़ों को खा सकें और हमारे पारिस्थितिकी तंत्र (भोजन) को सुरक्षित रख सकें।