चेतन भगत का कॉलम:हमें दुनिया से प्रतिस्पर्धा करने वाले शहर विकसित करने होंगे

Apr 30, 2026 - 06:09
चेतन भगत का कॉलम:हमें दुनिया से प्रतिस्पर्धा करने वाले शहर विकसित करने होंगे
ईरान युद्ध ने जहां दुनिया भर को प्रभावित किया है और भारत को भी तेल की ऊंची कीमतों और उससे पैदा होने वाली महंगाई के रूप में इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा, वहीं इसमें एक छिपा हुआ अवसर भी है। यदि इसे सही ढंग से साधा जाए तो यह हमारी आर्थिक वृद्धि को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकता है और सरकार के लिए पर्याप्त अप्रत्यक्ष-राजस्व उत्पन्न कर सकता है। क्या यह पढ़कर आप उत्सुक हो गए हैं? तब तो आगे पढ़ते रहें। मध्य-पूर्व लंबे समय से दुनिया के कुछ सबसे प्रमुख ग्लोबल-शहरों का घर रहा है। दुबई, अबू धाबी, दोहा, कुवैत सिटी, रियाद ने सुरक्षित, टैक्स-फ्रेंडली और बिजनेस-अनुकूल स्थानों के रूप में पहचान बनाई है। इसने दुनिया भर के प्रवासियों, उद्यमियों और हाई-नेटवर्थ वाले व्यक्तियों को आकर्षित किया है। हालांकि इन शहरों की ये विशेषताएं अब भी काफी हद तक कायम हैं, लेकिन भू-राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में वैश्विक निवेशक अब नए विकल्प खोजने लगे हैं। और इसी में भारत के लिए अवसर है। यह विचार तो खैर पहले से ही मौजूद था, लेकिन वर्तमान वैश्विक परिदृश्य इसे विशेष रूप से प्रासंगिक बनाता है। भारत अपने यहां ऐसे ही किसी टैक्स-फ्रेंडली और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी शहर को विकसित करने पर विचार कर सकता है- हांगकांग, सिंगापुर या दुबई जैसे मॉडलों का अपना संस्करण तैयार करते हुए। हमें मालूम होना चाहिए कि दुनिया के दूसरे देश पहले ही खुद को विकल्प के रूप में स्थापित करने लगे हैं। ग्रीस जैसे देश निवेश-आधारित निवास कार्यक्रमों (रेसीडेंसी-बाय-इनवेस्टमेंट) को बढ़ावा दे रहे हैं। हाल ही में तुर्किये ने भी नए निवासियों को आकर्षित करने के लिए विदेशी आय पर 20 वर्षों के टैक्स-हॉलिडे की घोषणा की है। यहां हांगकांग भी एक उपयोगी संदर्भ-बिंदु साबित हो सकता है, जो चीन का विशेष प्रशासनिक क्षेत्र है। चीन का हिस्सा होने के बावजूद वह एक अलग कानूनी, रेगुलेटरी और कर-ढांचे के तहत काम करता है, जहां करों की अपेक्षाकृत कम दरें और बेहतर ईज-ऑफ-डुइंग-बिजनेस है। ध्यान दिया जाना चाहिए कि दुनिया के कई सफल वैश्विक केंद्रों ने विकास को गति देने के लिए निम्न-कर नीतियों का उपयोग किया है। ऐसे मॉडलों में भी सरकारें वैकल्पिक माध्यमों- जैसे शुल्क, रियल एस्टेट डेवलपमेंट और आर्थिक गतिविधियों के जरिए राजस्व कमाती हैं। तेजी से वैश्वीकृत होती दुनिया में पूंजी और प्रतिभा अत्यंत गतिशील हो चुके हैं। यदि भारत प्रतिस्पर्धी इको-सिस्टम नहीं बनाता है, तो इनका प्रवाह अन्य क्षेत्रों की ओर चला जाएगा। सवाल यह नहीं है कि ऐसे केंद्र हमारे यहां होने चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि वे कहां पर बनने जा रहे हैं। क्यों न भारत के भीतर ही एक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी शहर विकसित किया जाए? केवल एनआरआई को टारगेट करने वाला रियल एस्टेट प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक पूर्ण रूप से फंक्शनल इकोनॉमिक-जोन, जहां व्यक्ति और व्यवसाय वैश्विक मानकों के अनुरूप काम कर सकें। जहां रहने वाले भारतीयों को, उस क्षेत्र के संदर्भ में, एनआरआई के समान ट्रीटमेंट मिले। जाहिर है कि इसका मतलब होगा उस शहर में अलग कानून लागू होंगे। वहां रहने और काम करने वालों के लिए पहचान पत्र जारी करने होंगे। यह सुनिश्चित करने के लिए एक तरह की ‘इमिग्रेशन’ प्रणाली भी बनानी होगी कि कौन अंदर आता है, कौन बाहर जाता है, और कौन वहां रह रहा है- आज की ट्रैकिंग तकनीकों से यह सब पूरी तरह संभव है। इसके लिए स्पष्ट कानूनी संरचनाओं, सुव्यवस्थित निवास प्रणाली और नीतिगत निश्चितता आवश्यक होगी। आधुनिक तकनीक और प्रशासनिक उपकरणों के साथ ऐसे तंत्र पूरी तरह लागू किए जा सकते हैं। कुछ लोग गुजरात की गिफ्ट सिटी (गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी) को इस दिशा में एक कदम के रूप में देख सकते हैं। निस्संदेह, यह एक आशाजनक शुरुआत है, जिसने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवाओं का इको-सिस्टम उपलब्ध कराया है। हालांकि, इसमें अभी भी वह पूर्ण स्वायत्तता और नीतिगत लचीलापन नहीं है, जो स्थापित वैश्विक केंद्रों में देखने को मिलता है। सही मायनों में प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारत को इस अवधारणा को अगले स्तर तक ले जाना ही होगा। एक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी आर्थिक शहर को विकसित करके हम पूंजी, प्रतिभा और इनोवेशन को आकर्षित कर सकते हैं। हमें इस अवसर का लाभ उठाकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वैश्विक पूंजी देश की सीमाओं के भीतर ही समृद्धि के निर्माण में योगदान दे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)