चेतन भगत का कॉलम:2011 और 2026 के भारतीय युवाओं में क्या अंतर आया है?
कॉकरोच जनता पार्टी या सीजेपी के देखते ही देखते करोड़ों फॉलोअर्स बन गए। लेकिन फॉलोअर्स की विशाल संख्या सोशल मीडिया हैंडलों पर थी। सड़कों पर नहीं। सीजेपी ने जंतर-मंतर पर एक वास्तविक सभा जरूर की और मीडिया ने भी इसे अच्छे से कवर किया। फिर भी वहां कुछ सौ या हजार लोग ही पहुंचे। भारत के मॉल्स में किसी मामूली सेलिब्रिटी के आने पर भी इससे ज्यादा भीड़ जुट जाती है। ऑनलाइन और ऑफलाइन के बीच इतना अंतर क्यों था? क्या जेन-जी आलसी है? या वे उतने असंतुष्ट नहीं हैं और अपेक्षाकृत आरामदायक जीवन जी रहे हैं? लेकिन यह एक सामान्यीकरण होगा। असली वजह इससे कहीं गहरी है। सीजेपी को समझना एक मायने में मौजूदा जेन-जी को समझने का भी एक बेहतरीन तरीका है। तुलना की जा रही है कि सीजेपी वर्ष 2011 के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन जैसी नहीं है। यह समानता समझ में आती है। दोनों ने जनता की निराशा को आवाज दी। दोनों ने युवाओं को आकर्षित किया। दोनों पारंपरिक राजनीतिक ढांचे से बाहर उभरे। लेकिन सीजेपी ने वैसा मामूली-सा भी जनसमर्थन पैदा नहीं किया, जैसा 2011 में अन्ना हजारे ने किया था। लेकिन इससे पहले हमें एक बड़े सवाल को समझना होगा : जब स्मार्टफोन के दौर में पली-बढ़ी डिजिटल-फर्स्ट पीढ़ी का सामना राजनीति से होता है, तो क्या होता है? क्योंकि 2011 और 2026 के बीच यही सबसे बड़ा अंतर है। 2011 में देश लगभग वही प्रमुख टीवी चैनलें देखता था। लोग एक जैसी सुर्खियों पर चर्चा करते थे। जंतर-मंतर पर हुआ प्रदर्शन राष्ट्रीय खबर बन जाता था, क्योंकि हर कोई एक ही स्क्रीन पर था। आज देश एल्गोरिदम से बने अलग-अलग डिजिटल दायरों में जीता है। कोई सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने वाला छात्र पूरा दिन यूपीएससी संबंधी वीडियो देख सकता है। कोई दूसरा स्टार्टअप से जुड़े प्रभावशाली लोगों को फॉलो करता है। तीसरा मेकअप ट्यूटोरियल देखता है। चौथा राजनीतिक मीम्स की दुनिया में रहता है। सभी ऑनलाइन हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि वे सभी एक ही वास्तविकता का अनुभव कर रहे हों। इससे लोगों को एकजुट व संगठित करना कठिन हो जाता है। 2011 के आंदोलन का एक मुद्दा था : भ्रष्टाचार खत्म करो। देश जानता था कि वह किस बात से नाराज है और क्या चाहता है। सीजेपी का मामला इससे अलग है। इसके समर्थक कई तरह की बातें करते हैं- बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाएं, पेपर लीक, जीवन-यापन की बढ़ती लागत, राजनीतिक अहंकार, अवसरों की कमी, युवाओं की निराशा। ये सभी वास्तविक चिंताएं हैं। समस्या यह है कि चिंताएं बहुत अधिक हैं। एक शिकायत के आधार पर देश को संगठित करना दस शिकायतों के आधार पर करने की तुलना में आसान होता है। फिर दोनों का लहजा भी अलग है। भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन गंभीर था। लगभग आध्यात्मिक। लोग गांधी-टोपी पहनकर रैलियों में जाते थे। उन्होंने उपवास तक किए! वहीं सीजेपी हास्य के माध्यम से उभरी। यह मीम्स, व्यंग्य, विडंबना पर आधारित है। यह पूरी तरह डिजिटल भी है, जिससे यह अविश्वसनीय गति से फैल सकती है। लेकिन इस प्रणाली के साथ एक समस्या है। बहुत से लोग इसमें शामिल हो सकते हैं। वे इसे पसंद करेंगे और साझा करेंगे, लेकिन जरूरी नहीं कि वे आंदोलन का हिस्सा बनने के लिए आगे आएं। और हर कंटेंट क्रिएटर इस कड़वी सच्चाई को जानता है। अगर लाखों युवा रोजगार और परीक्षाओं जैसे मुद्दों से जुड़ रहे हैं, तो ऐसा तब नहीं होता जब वे पूरी तरह संतुष्ट हों। निराशा वास्तविक है। सवाल यह है कि उसे व्यक्त कैसे किया जा रहा है। पुरानी पीढ़ी अकसर राजनीति को भौतिक कार्रवाई के माध्यम से देखती है- प्रदर्शन, विरोध, धरना, मार्च। लेकिन जेन-जी अलग साधनों के साथ बड़ी हुई है- पोस्ट करना, कमेंट करना, शेयर करना, कंटेंट बनाना। यहीं पर पुरानी और नई पीढ़ी के बीच गलतफहमी पैदा होती है। कोई बुजुर्ग व्यक्ति पूछ सकता है, अगर आप इतने नाराज हैं तो सड़कों पर क्यों नहीं हैं? एक युवा जवाब दे सकता है, अगर लाखों लोगों ने मेरी पोस्ट देख ली है, तो फिर सड़कों पर आने की जरूरत क्या है? 2011 में अगर लोगों को लगता था कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही, तो वे इकट्ठा होते थे। 2026 में अगर लोगों को लगता है कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही, तो वे पोस्ट करते हैं। सोशल मीडिया एक तरफ आवाज को बढ़ाने वाला माध्यम बन गया है, तो दूसरी तरफ दबाव निकालने का रास्ता भी। इंटरनेट राजनीतिक ऊर्जा के एक बड़े हिस्से को अपने भीतर समाहित कर लेता है, जो कभी सड़क पर उतरकर आंदोलन का रूप ले सकती थी। यह किसी कमजोर या आलसी पीढ़ी की कहानी नहीं है। यह एक ऐसी पीढ़ी की कहानी है, जो राजनीति को अलग तरीके से व्यक्त करती है। जो विरोध के बैनर उठाने से पहले अपने फोन की ओर हाथ बढ़ाती है। पर क्या डिजिटल आक्रोश वास्तविक दुनिया को बदल सकता है? (ये लेखक के अपने विचार हैं)