नवनीत गुर्जर का कॉलम:बंगाल के वोटरों का सूरज से मुकाबला
बड़ी गर्मी है। तेज। कड़क।
इतनी कि इस तेज धूप और गर्मी के चलते आसमान भी लाचार है। उसकी भी कनपटियों के नीचे के बाल पक चुके हैं!
जैसे नानी बाई के मायरे में जिन-जिन लोगों, रिश्तेदारों ने कपड़े-लत्तों के लिए ताने मारे थे, श्रीकृष्ण ने उन सब के माथों पर गठरियां-पोटलियां दे मारी थीं, उसी तरह सूरज भी धूप के थपेड़े मारते नहीं थक रहा। पंखे-कूलर काम नहीं कर पा रहे हैं। एसी भी जैसे-तैसे सांसें भर रहे हैं!
उधर पश्चिम बंगाल में चुनाव का, बम्पर वोटिंग का दौर बीते दिन ही खत्म हुआ है। इतनी गर्मी और उमस में कैसे वोट डाले होंगे, वहां के लोग ही जानते हैं। चुनाव आयोग और ज्यूडिशियरी के जरिए एसआईआर में 91.3 लाख वोट कटने के बावजूद पहले से ज्यादा वोट पड़ना किसी चमत्कार से कम नहीं है। अब आप कहेंगे इस मुई एसआईआर के बीच ज्यूडिशियरी कैसे आ गई?
दरअसल, चुनाव आयोग ने 58 लाख वोट एसआईआर के जरिए कम किए थे। उनमें से भी छह लाख फॉर्म 6 के जरिए वापस आ गए। अब हुआ यूं कि ममता बनर्जी को चुनाव आयोग पर विश्वास नहीं हुआ। वे मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जा दौड़ीं। सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर का काम ज्यूडिशियरी को सौंप दिया। उनकी निगरानी में 27 लाख वोट और कट गए। इस तरह कटने वाले कुल वोट हो गए 91 लाख। कोढ़ में खाज हो गई!
खैर, छोड़िए इस एसआईआर के मसले को।
…वैसे चुनावी माहौल में जीना भी एक तरह का जादू है। ख्वाब पैरों पर चलते हैं और उमंगें फूटती रहती हैं, जैसे पानी में रखे मूंग चटखते हैं। वोटों की गिनती को अब सिर्फ चार ही दिन बचे हैं और इतनी ही रातें। इसके पहले चुनाव प्रचार के दौरान दिनभर सारे नेताओं ने सूरज को माथे पर उठाए रखा, क्योंकि अगली चार रातें उनके ख्वाबों की रातें हैं। ख्वाब जो रंक को राजा बनाते हैं और राजा को महाराज। शुक्र है यह पूनम की रातें नहीं हैं, वरना सारे नेता चांद कमाने के लिए आसमान का सौदा कर बैठते!
एक मशहूर लेखक ने परदेस जाते समय अपने नाना की संपत्ति में से मिला गहनों और अशर्फियों से भरा एक ट्रंक अपने गांव गुजरांवाला की एक भक्त महिला के पास धरोहर के रूप में रखा था। लेखक को जीवन की सबसे बड़ी हैरानी तब हुई जब लौटकर धरोहर मांगने पर उस महिला ने एक ही जवाब दिया था- कैसा ट्रंक?
बंगाल में चुनाव प्रचार जोरों पर था, बड़े-बड़े नेता शहरों-गांवों में आ रहे थे और छोटे-छोटे घरों में। हाथ जोड़े। पैर पड़े। वादे भी किए। ऐसा कर देंगे। वैसा नहीं होने देंगे …और भी जाने क्या-क्या! चुनाव बाद बंगाल वालों को भी एक ही जवाब मिलने वाला है, जैसा उस भक्त महिला ने दिया था- कैसे वादे?
जब हमें ऐसा जवाब मिलता है तो वह बड़ा भयानक पल होता है। अंधेरा बादलों की तरह घिरता है और उदासी बूंद-बंूद बरसती है। शरीर में से जैसे कोई चुभी हुई सुइयां निकालता है, हम भी पहचान वालों के पास जाकर ये दुखड़ा सुनाते रहते हैं।
पांच साल इसके अलावा कोई चारा नहीं होता। इसलिए वोट हर हाल में लाख बार सोच-समझकर ही देना होता है। निश्चित ही बंगाल वालों ने ऐसा ही किया होगा। अगली चार मई को परिणाम सामने आ ही जाएगा और पता चल जाएगा कि आखिर बंगाल क्या चाहता है?
इधर बीच बंगाल चुनाव राज्यसभा के सात सदस्यों को लेकर भाजपा ने "आप' वालों का दिवाला निकाल दिया, सो अलग! उधर हॉर्मुज वाले भाई लोग कोई समाधान ढूंढ नहीं रहे हैं। उसकी दिशा में ज्यादा कुछ कर भी नहीं रहे हैं। एक दिन कुछ कहते हैं और दूसरे दिन कुछ और! तय है कि बंगाल चुनाव के बाद हॉर्मुज का असर हमारी जेबों पर भारी पड़ेगा।
फिर तेल देखिए और तेल की धार देखिए! गैस की किल्लत तो फिलहाल किसी तरह सम्भली हुई है, तेल जब बिखर पड़ेगा तो बहुत महंगा पड़ेगा।
कहते हैं इस बार बड़ी कांटे की टक्कर है बंगाल में। 23 अप्रैल को जो फर्स्ट फेज की वोटिंग हुई यानी उत्तर बंगाल में, उससे तो भाजपा इतनी उत्साहित है कि इस फेज की कुल 152 सीटों में से 110 को वो जीती हुई ही मान रही है। हां, 29 अप्रैल वाला सेकंड फेज थोड़ा मुश्किल लग रहा है। ये इलाका यानी दक्षिण बंगाल जिसका ज्यादातर हिस्सा बांग्लादेश से लगा हुआ है, तृणमूल कांग्रेस का गढ़ माना जाता है।
नतीजे ही बताएंगे कि कौन कितने पानी में है! आसमान का सौदा…
वोटों की गिनती को अब चार दिन बचे हैं और इतनी ही रातें। चुनाव प्रचार के दौरान दिनभर नेताओं ने सूरज को माथे पर उठाए रखा, क्योंकि अगली चार रातें उनके ख्वाबों की रातें हैं। शुक्र है यह पूनम की रातें नहीं हैं, वरना सारे नेता चांद कमाने के लिए आसमान का सौदा कर बैठते!