नवनीत गुर्जर का कॉलम:बंगाल जीत के बाद यूपी पर निर्भरता घटेगी
कहते हैं रेगिस्तान में दूर चमकती रेत को देखकर जिन्हें वहाँं पानी होने का भ्रम नहीं होता, जरूर उनकी प्यास में कोई कमी रही होगी! भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल वर्षों से एक तरह का राजनीतिक रेगिस्तान था। लेकिन उसकी प्यास में कोई कमी नहीं थी। आगे की सोच और उम्दा रणनीति ने आखिर भाजपा को जीत दिला ही दी। अब गंगोत्री से गंगासागर तक भारत भाजपामयी हो चुका है! पश्चिम बंगाल की जीत ने एक तरह से भाजपा के लिए 2029 के लोकसभा चुनाव में प्रचंड जीत का रास्ता भी खोल दिया है। पहले कभी कहा जाता था कि भारतीय राजनीति की हवा गंगा से होकर ही बहती है। मायने ये थे कि जिसका उत्तर प्रदेश, उसी का देश। चाहे वो जमाना नेहरू जी का हो, इंदिरा गांधी का या राजीव गांधी का। लेकिन तब से अब तक गंगा नदी में बहुत पानी बह चुका है! अभी 2024 के लोकसभा चुनावों को ही देख लीजिए- उत्तर प्रदेश में भाजपा को भारी नुकसान होने के कारण वह बहुमत से पीछे रह गई थी। लेकिन, अब बिहार और पश्चिम बंगाल में मजबूती के साथ पैर जमाने के बाद भाजपा की अकेले उत्तर प्रदेश पर निर्भरता बहुत कम हो जाएगी। वजहें साफ हैं। ममता के करीबी और उनकी पार्टी का कैडर सत्ता में न होने के कारण बिखरने लगेगा। धनबल कम होता जाएगा। बाहुबल तो बचेगा ही नहीं, जिसके दम पर 15 साल तक शासन, सरकार और पार्टी को चलाया गया। तृणमूल की यही कमजोरी अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को भर-भर के सीटें देगी। कमोबेश यही हाल बिहार में भी रहेंगे। नीतीश कुमार के दिल्ली यानी राज्यसभा में आने के बाद राज्य में उनका जदयू निश्चित रूप से कमजोर होगा, जिसका पूरा फायदा भाजपा को मिलेगा। क्योंकि गंगा तो आखिर बिहार और बंगाल में भी बहती ही है! जहां तक पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत का सवाल है, इसके पीछे लम्बे समय तक की कड़ी मेहनत शामिल है। रणनीति बनाना, फिर हार जाना। फिर रणनीति गढ़ना, फिर हार जाना, लेकिन हार नहीं मानना। और आखिर कर दिखाना। पिछले पंद्रह वर्षों में संघ और भाजपा के कितने ही कार्यकर्ता पिटे और पिटते रहे। कई को तो जान से भी हाथ धोना पड़ा, लेकिन किसी ने हार नहीं मानी। हर चुनाव के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं को पिटने का खौफ हुआ करता था। बूथ लेवल पर पार्टी के पास पर्याप्त कार्यकर्ता नहीं हुआ करते थे। लेकिन इस बार रणनीतिक रूप से गृह मंत्री अमित शाह ने ये सारी कमियां दूर कीं। पांच-पांच महीने पहले से लोगों को तैयार किया। पश्चिम बंगाल में कैम्प कराया। वहां के कार्यकर्ताओं के मन से भय को भगाया। तब जाकर इस बार यह कामयाबी हाथ आई है। ममता के गढ़ साउथ बंगाल में भी तृणमूल के तिनके बिखेर देना मामूली बात नहीं है। खुद ममता को भवानीपुर से हरा देना, किसी आश्चर्य से कम नहीं। दरअसल, ममता बनर्जी की कमी यह रही कि जिस मां, माटी और मानुष का नारा देकर वे 15 साल पहले सत्ता में आई थीं, धीरे-धीरे उसी से दूर होती गईं। पार्टी कार्यकर्ताओं को कमाने, धमकाने, मारने-पीटने की खुली छूट देकर उन्होंने समझा कि इनके बल पर चुनाव जीतना ही परम उद्देश्य है। लोगों की, उनके हितों की, उनके आस-पास के विकास की चिंता न उन्होंने की और न ही कार्यकर्ताओं को कभी इस दिशा में मोटिवेट किया। विकास होता, लोगों का भला सोचा जाता, तो हो सकता है पंद्रह साल की एंटी-इन्कम्बेन्सी भी जनता सह लेती। नाराजगी कुछ हद तक तो कम हो ही सकती थी। ममता की इन्हीं सब कमियों को भाजपा ने मुद्दा बनाया। भाजपा की रणनीति में इस बार सबसे बड़ा बदलाव यह था कि उसने ममता पर कोई पर्सनल अटैक नहीं किया। गृह मंत्री अमित शाह ममता के शासन की कमियां गिनाते रहे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांग्ला और बंगाल से जुड़ी चीजों पर फोकस किया। यही वजह है कि आज हर तरफ झालमुड़ी की चर्चा है। अपनी प्रचंड जीत की खुशी में भी भाजपा ने मिठाई के बजाय झालमुड़ी बंटवाई। ये झालमुड़ी और कुछ नहीं इंदौर की लाई-सेव की ही सगी बहन है। खाई ये उत्तर प्रदेश और बिहार में भी जाती है, लेकिन पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री मोदी ने एक दुकान पर दस रुपए देकर झालमुड़ी क्या खाई, ये पूरी चुनावी राजनीति का स्टेटस सिम्बल बन गई। ममता को इसी झालमुड़ी का जोरदार झटका लगा और तृणमूल तृण-तृण हो गई! बिहार और बंगाल में मजबूती 2024 के लोकसभा चुनावों में यूपी में भाजपा को भारी नुकसान होने के कारण वह बहुमत से पीछे रह गई थी। लेकिन अब बिहार और बंगाल में मजबूती से पैर जमाने के बाद भाजपा की अकेले यूपी पर निर्भरता बहुत कम हो जाएगी।