पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:जब कभी भी हमारा अपमान हो तो उससे विचलित ना हों
अपने भक्त का हित करने का ढंग भी भगवान का निराला है। जैसे किसी बच्चे को फोड़ा हो जाए तो उसकी मां उसका इलाज कराती है। उसमें भी पीड़ा है, लेकिन मां जानती है कि भविष्य में यह फोड़ा और तकलीफ नहीं देगा। ऐसे ही भगवान अपने भक्तों की स्थिति-परिस्थिति में चीर-फाड़ करते रहते हैं। उनमें से एक है- अहंकार। किसी भी सफर पर निकलें तो सामान का वजन कम से कम हो तो सुविधाजनक होता है। सफर में तीन पड़ाव हैं- पहला है बैठना, दूसरा चलना, तीसरा उतरना। हमारे जीवन में भी गर्भाधान बैठना है, मकान-दुकान चलना है और श्मशान उतरना है। इन तीनों के बीच की यात्रा में हम अभिमान रूपी वजन सिर पर रखते हैं और वजन अधिक हो तो चाल लड़खड़ाएगी ही। तुलसीदास जी ने लिखा है- तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि। श्रीराम अपने दास का अभिमान उसके हित के लिए हर लेते हैं। जब कभी हमारा अपमान हो तो विचलित ना हों, बल्कि सोचें कि यह हमें अभिमान रहित करने के लिए किया गया है।