पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:बदलते समय में परिवारों का आधार परमात्मा होना चाहिए

May 23, 2026 - 06:05
पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:बदलते समय में परिवारों का आधार परमात्मा होना चाहिए
कुछ बातों ने बाहर का जीवन तो दूभर कर ही दिया है- शोर, शराबा, शराब, शान, शौकत। इनके कारण बाहर की दुनिया बड़ी विचित्र-सी और बेचैन करने वाली हो गई। एक वक्त था जब शांति की तलाश में लोग बाहर से घर आते थे। लेकिन अब ये बातें घर में भी आ गईं। घर में भी शोर है। सदस्य एक-दूसरे से अपशब्द और बड़बोलापन कर रहे हैं। घर-परिवार में कोई कार्यक्रम हो तो लोग शिकायती शब्द, फूला चेहरा लेकर दिखने लगते हैं। शराब जैसे जहर को लोग कीमती जल मानने लगे हैं। शोर इतना हो गया कि मानसिक रोग में बदल रहा है। शान यानी गौरव, गरिमा- जो एक आंतरिक भाव है- धीरे-धीरे शौकत में बदल गया। शौकत में भव्यता है, तड़क-भड़क है, लेकिन प्रदर्शन है। रिश्ते या तो सौदे बन गए या प्रदर्शन की वस्तु। कुछ मिले नहीं तो कोई किसी के लिए कुछ करता नहीं है। ऐसे बदलते समय में कम से कम परिवारों का आधार परमात्मा होना चाहिए। और उसका प्रयोग है- योग। समय आ गया है कि घरों में लोग सामूहिक योग करें।