पलकी शर्मा का कॉलम:सस्ती एनर्जी का दौर फिलहाल के लिए तो खत्म हो चुका है
वैश्विक तेल संकट अब भारत के घरेलू बजटों को प्रभावित करने वाला है। दुनिया भर में सरकारें पहले ही किसी न किसी रूप में ऊर्जा-अनुशासन लागू करने लगी हैं। श्रीलंका ने चार-दिवसीय वर्क-वीक और ईंधन पास की नीति लागू की है। बांग्लादेश ने ईंधन की राशनिंग शुरू कर दी है। फिलीपींस ने ऊर्जा आपातकाल घोषित कर दिया है। दक्षिण कोरिया ने तीन दशकों में पहली बार ईंधन मूल्य सीमा लागू की है। जापान ने रिकॉर्ड रणनीतिक भंडार जारी किए। यूरोपीय देश नागरिकों को ऊर्जा बचाने की चेतावनी दे रहे हैं, क्योंकि कई बाजारों में पेट्रोल की कीमतें 200 रु. प्रति लीटर से ऊपर पहुंच चुकी हैं। सस्ती एनर्जी का युग समाप्त हो चुका है, कम-से-कम फिलहाल के लिए। इसका कारण हजारों किलोमीटर दूर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में निहित है। यह संकीर्ण जलमार्ग दुनिया की लगभग 20% तेल आपूर्ति के लिए जिम्मेदार है। ईरान युद्ध इस महत्वपूर्ण मार्ग को अनिश्चितता के क्षेत्र में बदल चुका है। तेल टैंकरों के मार्ग बदले जा रहे हैं, शिपिंग बीमा लागतों में विस्फोटक वृद्धि हुई है, माल ढुलाई की लागत बढ़ गई है और आपूर्ति शृंखलाएं बाधित हैं। भारत तो दुनिया की सबसे अधिक प्रभावित अर्थव्यवस्थाओं में है। हमारे लगभग 50% कच्चे तेल और 90% रसोई गैस का आयात होर्मुज से होता है। सरल शब्दों में कहें तो जब पश्चिम एशिया में आग लगती है तो खामियाजा भारत को भुगतना पड़ता है। अभी तक भारतीय उपभोक्ताओं को इस संकट के सबसे बुरे प्रभाव से बचाकर रखा गया है। वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के बावजूद पेट्रोल और डीजल की कीमतें अधिकांशतः स्थिर बनी हुई हैं। न तो राशनिंग हुई है, न पेट्रोल पंपों के बाहर लंबी कतारें लगी हैं। लेकिन इसकी भी एक कीमत चुकानी पड़ी है। सरकार ने उत्पाद शुल्क में कटौती की। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने भारी अंडर-रिकवरी का बोझ उठाया। रिफाइनरियों को असामान्य रूप से ऊंची क्षमता पर काम करने के लिए मजबूर किया गया। एक तरह से राज्य ने उस झटके का एक हिस्सा स्वयं वहन किया, जिसे अन्यथा बाजार सीधे उपभोक्ताओं पर डाल देता। आलोचकों का कहना है कि यह कदम राजनीतिक कारणों के चलते उठाया गया, कि चुनाव समाप्त होने तक ईंधन की कीमतों को कृत्रिम रूप से दबाकर रखा गया, और अब उपभोक्ताओं को मूल्य-वृद्धि के लिए तैयार किया जा रहा है। लेकिन यह तर्क उस व्यापक हकीकत की अनदेखी करता है, जिसका सामना हर तेल-आयातक अर्थव्यवस्था कर रही है। दुनिया भर की सरकारों के सामने यही दुविधा थी कि झटके को तुरंत उपभोक्ताओं पर डाल दिया जाए और महंगाई को भड़का दिया जाए, या उसे अस्थायी रूप से स्वयं वहन किया जाए। अधिकांश सरकारों ने किसी न किसी रूप में हस्तक्षेप का रास्ता चुना। भारत ने भी यही किया। क्योंकि ईंधन की कीमतें पेट्रोल पम्प पर लिखे अलग-थलग आंकड़े नहीं होतीं, उनका प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था में फैलता है- डीजल की ऊंची कीमतें परिवहन लागत बढ़ाती हैं, इससे खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ते हैं, मैन्युफैक्चरिंग महंगी हो जाती है, हवाई यात्रा की लागत बढ़ जाती है और महंगाई व्यापक रूप से फैलकर असर डालती है। यदि युद्ध कल समाप्त हो जाए, तब भी कीमतें अचानक सामान्य नहीं होंगी। टैंकरों को पहुंचने में हफ्तों लगते हैं, युद्धविराम की घोषणा के बाद भी बीमा दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, देशों को अपने घट चुके भंडार फिर से भरने में समय लगता है, व्यापारी सतर्क बने रहते हैं, और आपूर्ति शृंखलाएं धीरे-धीरे ही सामान्य हो पाती हैं। आप इसकी कीमत या तो सीधे ऊंचे ईंधन दामों के रूप में चुकाते हैं, या अप्रत्यक्ष रूप से करों, महंगाई, राजकोषीय दबाव और सरकार के अन्य क्षेत्रों में घटे हुए खर्च के माध्यम से। इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)