प्रियदर्शन का कॉलम:विकास को बराबरी से बांटने की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है
अप्रैल में देश के जीएसटी संग्रह ने रिकॉर्ड तोड़ दिया। 2.43 लाख करोड़ का कर-संग्रह हुआ, जो कि बीते वर्ष इसी महीने तक हुए कर-संग्रह से 8.7% ऊपर है। उद्योग-धंधों के मोर्चे पर यह अच्छी खबर है, जिसका स्वागत होना चाहिए। इस युद्धकाल में- जब दुनिया कई तरह के अनिश्चय से घिरी हुई है- भारत की यह आर्थिक मजबूती आश्वस्त करती है। सरकार उचित ही भरोसा दिलाती है कि हमारी अर्थव्यवस्था की बुनियाद बेहद मजबूत है और हमें मामूली झटकों से- यानी गैस या तेल के दाम बढ़ने से घबराना नहीं चाहिए।लेकिन क्या हम अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर अच्छी खबरें जुटाने और एक सकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश में कुछ उन चुनौतियों की अनदेखी कर रहे हैं, जो अरसे से हमारा पीछा कर रही हैं और हमारी आर्थिक सेहत को नुकसान पहुंचा सकती हैं? मसलन, इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में हम पिछले कुछ दिनों में अपनी दो हैसियतें गंवा बैठे हैं। बीते दिनों यह बात बार-बार दुहराई गई कि हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं और अब जल्द ही तीसरे नंबर पर होंगे। लेकिन अगर वर्ल्डोमीटर पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़े देखें तो यह बात हैरान करती है कि हम अचानक चौथे से छठे नंबर पर आ गए हैं। अमेरिका अपनी 32 ट्रिलियन पार और चीन अपनी 20 ट्रिलियन पार जीडीपी के साथ हमसे काफी आगे तो है ही, जर्मनी-जापान भी हमसे आगे हैं और जिस ब्रिटेन को हमने पीछे छोड़ा था, वह भी अब आगे निकल आया है। अगर यह युद्धकाल का नतीजा है, तब तो वह सबके लिए है- उस यूरोप के लिए कुछ ज्यादा ही, जिसका अमेरिका से कूटनीतिक रिश्ता भी क्षतिग्रस्त है और ईरान और रूस दोनों की चुनौतियों के बीच उसका कारोबार भी कुछ फंसा हुआ है। अभी तो हमारे सामने पांच ट्रिलियन डॉलर की रेखा पार करने की ही चुनौती है, जिसे जर्मनी पहले ही लांघ चुका है। यह स्थिति तब है जब रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार गिर रहा है और फिलहाल 95 को छूता नजर आ रहा है। यह स्थिति मौजूदा युद्धों से पहले से है। हालांकि यह तो अर्थशास्त्री ही बता सकते हैं कि रुपए के उठने-गिरने का विकास-दर से कैसा वास्तविक संबंध होता है। इसी तरह जो दूसरा और ज्यादा चिंताजनक मसला है, वह प्रति व्यक्ति आय का है। दरअसल प्रति व्यक्ति आय ही समाजों के भीतर आय के वितरण की समानता और खुशहाली का वास्तविक आईना होती है। इस मामले में तो भारत का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक है। भारत वर्ल्डोमीटर के ही ताजा आंकड़ों के मुताबिक प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से दुनिया में 172वें नंबर पर है। सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला अमेरिका भी हालांकि इस सूची में 11वें नंबर पर है, फिर भी वहां की प्रति व्यक्ति आय 94,430 डॉलर सालाना ठहरती है। 98वें नंबर पर मौजूद चीन की भी प्रति व्यक्ति आय 14,874 डॉलर सालाना है। लेकिन हमारे यहां प्रति व्यक्ति आय महज 2,893 डॉलर सालाना है- यानी इन देशों के मुकाबले काफी कम। हमारे पड़ोसियों में भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश हमसे आगे हैं- दरअसल दुनिया के ज्यादातर देश हमसे आगे हैं। हम बस यह संतोष कर सकते हैं कि हम पाकिस्तान से आगे हैं। पाकिस्तान 186वें नंबर है। और पाकिस्तान चाहे तो यह संतोष कर सकता है कि वह भले जाम्बिया से नीचे है, लेकिन नाइजीरिया और नेपाल से ऊपर है। ये आंकड़े देने का मकसद यह साबित करना नहीं है कि हमारे विकास की कहानी झूठी है- वह बिल्कुल सच्ची है, इसके प्रमाण हमारे शहरों, हमारी सड़कों, उन सड़कों पर चलती गाड़ियों, नए बनते मॉल्स- सब जगह मिलते हैं। लेकिन यह याद दिलाना जरूरी है कि 140 करोड़ की आबादी वाले भारत का यह विकास अभी अधूरा है और हमें अपने विकास के समान वितरण की किसी भी दौर से आज ज्यादा जरूरत है। सबसे बड़ी बात यह है कि हममें यह क्षमता है कि हम यह समानता भी अर्जित कर सकें और दूसरे देशों से आगे भी निकल सकें, लेकिन यह तब होगा जब हम इन चुनौतियों को खुली आंखों से देखेंगे- न कि अपनी काया की कमजोरी या सीमा को ऊपरी शृंगार और सजावट से छुपाने की कोशिश करेंगे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)