प्रियदर्शन का कॉलम:सच्चाई यही है कि लोकसभा सीटों का परिसीमन जरूरी है

Apr 24, 2026 - 06:04
प्रियदर्शन का कॉलम:सच्चाई यही है कि लोकसभा सीटों का परिसीमन जरूरी है
संविधान संशोधन बिल गिर चुका है। विपक्ष का कहना था कि सरकार महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन को साधने में लगी है। लेकिन परिसीमन को लेकर जो भी विवाद हो, यह सच्चाई है कि लोकसभा सीटों के परिसीमन की जरूरत है- संवैधानिक रूप से भी और व्यावहारिक तौर पर भी। आखिरी बार 1976 में लोकसभा सीटों का परिसीमन हुआ था और करीब 10 लाख लोगों पर एक सांसद की व्यवस्था के हिसाब से करीब 55 करोड़ की आबादी के लिए 550 सांसद तय किए गए थे। तभी अगले 25 साल- यानी 2001- तक सीटों के परिसीमन पर रोक लगाा दी गई थी। 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने फिर 25 साल के लिए यह रोक बढ़ा दी। यानी अब 2026 में परिसीमन की जरूरत है। इस जरूरत का व्यावहारिक पहलू यह है कि फिलहाल औसतन 26 लाख लोगों पर एक सांसद पड़ते हैं। जाहिर है, यह लगभग असम्भव जनप्रतिनिधित्व है। लेकिन संकट यह है कि जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्सीमन दक्षिण के उन राज्यों की राजनीतिक ताकत और हैसियत कम कर देगा, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण का उचित काम किया है। सरकार ने इसके लिए जो रास्ता निकाला है- सभी राज्यों की सीटें सीधे-सीधे 50 फीसदी बढ़ा देने का- वह फिर भी समस्या का हल नहीं करता, क्योंकि अंततः इसका फायदा भी बड़े राज्यों को मिलेगा, जिनका संख्याबल और बड़ा होता जाएगा। दूसरी बात यह कि इससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का जो जनसांख्यिकीय सिद्धांत हमने अपनाया हुआ है, वह क्षतिग्रस्त होता है। फिर रास्ता क्या है? दरअसल दक्षिण की मूल शिकायत को समझने की जरूरत है। भारत का संघीय ढांचा चंद बड़े राज्यों की पकड़ में है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार लगभग आधी लोकसभा बना देते हैं। बाकी राज्यों की अहमियत कम रह जाती है। आबादी के हिसाब से परिसीमन हो या 50 फीसदी के अनुपात से, अंतत: ताकत उन्हीं की बढ़ेगी। भारत का संघीय ढांचा कसमसाता रहेगा। दरअसल भारत को फिर से राज्यों के पुनर्गठन की जरूरत है। 1956 में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया था। उसके बाद बेशक कई और राज्य बने- सिक्किम आकर जुड़ा, बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश को तोड़ कर झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ बने, आंध्र प्रदेश से निकाल कर तेलंगाना बनाया गया, जम्मू-कश्मीर से उसकी राज्य की हैसियत छीनी गई, लेकिन जरूरत कहीं ज्यादा बड़े बदलावों की है। जो बहुत बड़े राज्य हैं, उन्हें एक से अधिक हिस्सों में बांटा जा सकता है। 2011 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते मायावती ने बाकायदा उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव भेजा था। इस प्रस्ताव के तहत पूर्वांचल, अवध प्रदेश, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश या पश्चिम प्रदेश बनाए जाने थे। आज जब यूपी की आबादी 20 करोड़ के पार है, तब यह विभाजन इस राज्य को कुछ दौड़ सकने लायक हल्कापन दे सकता है। बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और तमिलनाडु को भी कम से कम दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। लेकिन यह पूरी कवायद बहुत सावधान पुनर्गठन की मांग करती है। ऐसा पुनर्गठन संभव हुआ तो संघीय ढांचे पर कुछ राज्यों के वर्चस्व की शिकायत घटेगी। जैसे हिंदीभाषी एक से ज्यादा राज्य हैं, वैसे ही मराठी या बांग्ला बोलने वाले एक से ज्यादा राज्य हो सकते हैं। यही बात तमिल या कन्नड़ बोलने वाले राज्यों के साथ भी हो सकती है। नए राज्यों के गठन में उनकी सांस्कृतिक बुनावट का भी ध्यान रखा जा सकता है और कुछ राज्यों की सीमाएं इधर-उधर की जा सकती हैं। छोटे राज्य होंगे तो विकास की योजनाएं बेहतर ढंग से बन सकेंगी। हो सकता है यह बात बड़े राज्यों के मुख्यमंत्रियों को रास नहीं आए। मसलन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को यह गवारा नहीं हो सकता है कि उत्तर प्रदेश कई हिस्सों में बंटे, क्योंकि इससे उनकी भी राजनीतिक ताकत कम होगी। लेकिन अगर हम चाहते हैं कि भारत का संघीय ढांचा स्वस्थ रहे और दक्षिण के राज्य सौतेलेपन की शिकायत न करें तो देर-सबेर हमें राज्यों के पुनर्गठन की ओर बढ़ना होगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)