मनोज जोशी का कॉलम:युद्ध को लेकर ट्रम्प के पास अब समय कम ही बचा है

Apr 29, 2026 - 06:08
मनोज जोशी का कॉलम:युद्ध को लेकर ट्रम्प के पास अब समय कम ही बचा है
अमेरिका-ईरान युद्ध को चलते अब दो माह हो गए। वेनेजुएला के अनुभव से अति-उत्साहित होकर अमेरिका ने सोचा था कि ईरान पर अचानक हमला और उसके सर्वोच्च नेता समेत शीर्ष अधिकारियों की हत्या की रणनीति से युद्ध कुछ ही दिनों में खत्म हो जाएगा। लेकिन रणनीति सफल नहीं हुई। ईरान में सत्ता परिवर्तन हुआ, लेकिन अब वहां इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) का शासन चल रहा है। ईरान में दो समानांतर सैन्य ढांचे हैं। ‘आर्तेश’ नियमित सेना के तौर पर परंपरागत प्रतिरक्षा का जिम्मा संभालती है, जबकि आईआरजीसी का काम क्रांति की रक्षा करना है। एक सेना राष्ट्रपति के जरिए सर्वोच्च नेता को रिपोर्ट करती है, जबकि दूसरी सीधे उन्हीं को। अमेरिका-इजराइल की शुरुआती बमबारी के बाद ‘बंधक संकट’ सामने आया। ईरान ने खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देशों और हॉर्मुज स्ट्रेट को एक तरह से बंधक बना लिया। इस स्थिति से निपटने के दो विकल्प थे। पहला, मिलिट्री एस्केलेशन यानी ईरानी जमीन पर सैनिक भेजना और ईरानी ढांचों पर हमले। और दूसरा, कूटनीतिक समझौता। ट्रम्प ने दूसरा रास्ता चुनते हुए ईरान को बड़ी आर्थिक रियायतों की पेशकश की है। बदले में उसके संवर्धित यूरेनियम भंडार सौंपने और हॉर्मुज को खोलने की मांग की है। ट्रम्प के दावों के विपरीत ईरान ने प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उसे लगता है कि वे भरोसे लायक नहीं और उनकी मांग ईरान के आत्मसमर्पण जैसी है। अमेरिका जो पेशकश कर रहा है, वह 2015 की संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) और उन प्रस्तावों से भी बदतर है, जो युद्ध से पहले ओमान की मध्यस्थता वाली बातचीत में ​दिए गए थे। ईरान को यह भी लगता है कि अब इसे स्वीकार करने की बाध्यता नहीं, क्योंकि सत्ता परिवर्तन तो वह झेल ही चुका है। साथ ही उसने यह भी जान लिया है कि हॉर्मुज स्ट्रेट बंद करना आर्थिक युद्ध में बेहद प्रभावी हथियार है। फिलहाल आगे की राह का अनुमान लगाया जा सकता है। अमेरिका संभवत: सैनिक नहीं भेज कर बातचीत ही जारी रखेगा। ट्रम्प शैली के अनुसार इसमें कुछ धमकियां होंगी, कुछ बमबारी संभव है। लेकिन अमेरिका के लिए समय अब हाथ से निकल रहा है। हमले शुरू करने से पहले अमेरिका को यह समझना चाहिए था कि सैन्य अभियान से क्या हासिल हो सकता है। सैन्य क्षमता के लिहाज से ईरान अमेरिका का मुकाबला नहीं कर सकता, लेकिन उसके पास बैलिस्टिक मिसाइलों और प्रॉक्सी नेटवर्क जैसी अहम क्षमताएं हैं। अमेरिका को यह भी पता होना चाहिए ​था कि इस्लामिक शासन की आंतरिक एकजुटता और संगठित विपक्ष के अभाव के चलते वहां सत्ता परिवर्तन आसान नहीं। साथ ही, इसके लिए जमीनी सैन्य अभियान जरूरी है, जो अमेरिका चाहता नहीं था। अमेरिका-इजराइल के सैन्य हमलों ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को काफी नुकसान जरूर पहुंचाया है, लेकिन इससे वैज्ञानिक ज्ञान और मानव पूंजी को समाप्त नहीं किया जा सकता। इतिहास गवाह है कि जो देश परमाणु हथियार चाहते हैं, वे जैसे-तैसे पा ही लेते हैं। ज्यादा से ज्यादा अमेरिका-इजराइल इसे कुछ समय टाल सकते हैं। इसी तरह, ईरान के मिसाइल और ड्रोन के जखीरे को कम किया जा सकता है, लेकिन खत्म करना मुश्किल है। खासकर, इस हथियार कार्यक्रम को सपोर्ट करने वाले तकनीकी ज्ञान और औद्योगिक ढांचे को। सच तो यह है कि अमेरिका-इजराइल ने खामेनेई एवं अन्य नेताओं की हत्या करके बड़ी गलती कर दी। अब ट्रम्प खुद ही कह रहे हैं कि ईरान में नेतृत्व बिखरा हुआ है और बातचीत के लिए कोई है ही नहीं। संघर्ष विराम बढ़ाने और समुद्री नाकेबंदी कड़ी करने से अमेरिका को समय मिल सकता है, लेकिन इससे ईरान झुकेगा नहीं। नाकेबंदी का असर दिखने में महीनों लग सकते हैं। ट्रम्प में इतना धैर्य नहीं। नवंबर में चुनाव भी हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)