मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:अंग्रेजों के जमाने के कानूनों का आज के दौर में क्या काम

Jun 24, 2026 - 06:14
मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:अंग्रेजों के जमाने के कानूनों का आज के दौर में क्या काम
संसद ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए ऐसा कानून पारित किया है, जो पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को खत्म करने तथा न्याय प्रक्रिया को तेज करने में गेम-चेंजर साबित हो सकता है। जन विश्वास अधिनियम, 2026 अप्रैल में लागू हुआ था। इसके जरिए ऐसे कानूनों को निरस्त किया गया, जिन्होंने न्याय-व्यवस्था को बाधित कर रखा था। इसके तहत एक हजार से अधिक कानून हटाए जा चुके हैं। न्यायपालिका पर इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के अचरज कौर टुटेजा, ईशान बंबा और नवेद महमूद अहमद उस टीम का हिस्सा थे, जिसने इस प्रक्रिया को बेहतर करने में उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) की मदद की। उन्होंने अपने एक लेख में लिखा कि 2026 के इस अधिनियम की प्रमुख खूबी इसका विशाल दायरा है। संसद ने एक ही विधायी प्रक्रिया में 23 मंत्रालयों से जुड़े 79 केंद्रीय कानूनों में संशोधन किया, 784 प्रावधानों में सुधार किया और 1018 अपराधों पर इसका असर पड़ा है। इन खूबियों से यह भारत में अब तक की सबसे बड़ी डी-क्रिमिनलाइजेशन कवायद बन गया है। जो कानून निरस्त किए गए, उनमें से कई आजादी के बाद बनाए गए थे। इनमें से कई में तो सामान्य गतिविधियों को भी अपराध माना जाता था। ‘विधि’ की लीगल टीम ने एक उदाहरण दिया। कल्पना कीजिए कि एक स्ट्रीट वेंडर रेलवे स्टेशन के बाहर चाय की छोटी-सी दुकान चलाता है। शाम तक वह गुजारे लायक कमा लेता है। लेकिन वह एक साल तक जेल जाने के जोखिम में रहता है, क्योंकि रेलवे क्षेत्र में बिना लाइसेंस फेरी लगाने पर पहले एक साल की कैद हो सकती थी। रोजमर्रा की कई दूसरी गतिविधियों में भी अपराधी ठहराए जाने का खतरा मंडराता रहता था। मसलन, किसी दूसरे यात्री को आवंटित सीट छोड़ने से इनकार करना, छावनी क्षेत्रों में भीख मांगना या छह वर्ष या उससे अधिक उम्र के बच्चे को सार्वजनिक स्थान पर शौच करने देना। कुछ अपराध तकनीकी प्रकृति के थे- जैसे रिटर्न दाखिल न करना, लाइसेंस न दिखाना या लिखित अनुमति के बिना विज्ञापन करना। ये कार्य न तो गंभीर रूप से हानिकारक हैं और न ही आपराधिक मंशा से किए जाते हैं। यदि इनसे कोई नुकसान होता भी है तो उसे आसानी से सुधारा जा सकता है। अंग्रेजों के जमाने के भी कई कानून हटाए गए हैं। इनमें ऐसे छोटे-मोटे अपराध शामिल थे, जिन्हें ब्रिटिश अधिकारियों ने गैरकानूनी घोषित कर दिया था। मसलन, आजादी से पहले किसी कुएं के पास नहाना अपराध माना जाता था और अप्रैल 2026 में निरस्त किए जाने तक यह कानून प्रभावी रहा! औपनिवेशिक काल और आजाद भारत तक देश में सदियों से ऐसा कानूनी ढांचा बनाया गया, जो आमजन को दंडित करता और राज्यसत्ता को असीमित ताकत देता रहा है। आमजन आज भी ‘तारीख पर तारीख’ वाली स्थिति का सामना करते हैं। लेकिन जन विश्वास अधिनियम जैसी सुधारवादी पहल सकारात्मक प्रभाव लाती है। लोकसभा में यह कानून पारित होने के तुरंत बाद महाराष्ट्र ने राज्य में 80 अप्रचलित कानूनों को निरस्त कर दिया। इनमें से कुछ तो बाबा आदम के जमाने के थे। उदाहरण के लिए, 1864 और 1909 के व्हिपिंग एक्ट चोरी और दुष्कर्म के लिए अधिकतम 150 कोड़ों की सजा देते थे! हालांकि कानूनी किताबों की ये सफाई पहले ही हो जानी चाहिए थी, लेकिन कानून और न्यायिक व्यवस्था की अनेक मूल समस्याएं अब भी जस की तस हैं। न्यायिक व्यवस्था में गहरे सुधारों की दरकार है। जन विश्वास अधिनियम, 2026 के तहत अप्रचलित कानूनों को हटाने के अलावा आपराधिक न्याय प्रणाली को भी एक नए प्रशासनिक ढांचे की जरूरत है। वरिष्ठ वकीलों को बार-बार एडजर्नमेंट मांगने से रोका जाना चाहिए। नेशनल जुडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन (एनजेएसी) को फिर से लागू करना भी आवश्यक है। आजादी से पहले किसी कुएं के पास नहाना अपराध माना जाता था और अप्रैल 2026 में निरस्त किए जाने तक यह कानून प्रभावी रहा! औपनिवेशिक काल में ऐसा कानूनी ढांचा बनाया गया था, जो आमजन को दंडित करता हो। (ये लेखक के अपने विचार हैं)