
मेला प्रशासन और गांव वालों के बीच तीखी नोकझोंक ने मेले की रंगत को फीका कर दिया है। गुस्साए ग्रामीणों ने बाज़ार बंद कर विरोध जताया है, तो जिला प्रशासन अपनी ढीली तैयारियों के लिए आलोचना झेल रहा है। न कोई ठोस इंतज़ाम दिख रहा है, न ही सुचारु व्यवस्था का नामोनिशान। मेला प्रशासन के बड़े-बड़े दावे हवा में उड़ गए हैं, और कुछ अधिकारियों की मनमानी ने मेले को अव्यवस्था का अड्डा बना दिया है। श्रद्धालु निराश हैं, दुकानदार परेशान हैं, और बाबा के भक्त यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या इस बार श्याम बाबा का आशीर्वाद भी प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ जाएगा? बाज़ार की सन्नाटे भरी गलियां और मेले का बेरंग माहौल इस पवित्र आयोजन की आत्मा पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
“खाटूश्याम जी के फाल्गुनी मेले की शहनाई बजनी शुरू हुई, मगर इस बार ताल बेसुरा सा लग रहा है। एक तरफ गांव वालों का गुस्सा, जिन्होंने बाज़ार बंद कर प्रशासन को चुनौती दी है, तो दूसरी तरफ जिला प्रशासन की सुस्ती, जिसने मेले को अव्यवस्था के दलदल में धकेल दिया है। बाबा के भक्तों की भीड़ तो आई, मगर उन्हें न सुविधा मिली, न व्यवस्था का सहारा। मेला प्रशासन ने जो सपने दिखाए थे—साफ-सफाई, सुरक्षा, और शानदार इंतज़ाम—वो सब कागज़ों तक सिमट कर रह गए। उल्टा, कुछ अधिकारियों की मनमर्ज़ी ने मेले को ऐसा मज़ाक बना दिया कि न श्रद्धा की लौ जल रही है, न व्यापार की चहल-पहल दिख रही है। ग्रामीण चिल्ला रहे हैं, ‘हमारी बात सुनी जाए,’ और प्रशासन कह रहा है, ‘सब ठीक हो जाएगा,’ मगर सच यह है कि खाटूश्याम जी का मेला इस बार अपनी पहचान खोता नज़र आ रहा है। क्या बाबा का चमत्कार इस बार प्रशासन को राह दिखाएगा, या मेला अव्यवस्था की भेंट चढ़कर इतिहास में एक बदनुमा दाग बन जाएगा?”