Home language जहाँ देश भर में होली का त्योहार रंगों, गुलाल और मिठाइयों के साथ मनाया जाता है, वहीं राजस्थान के उदयपुर जिले का एक छोटा सा गांव मेनार अपनी अनोखी परंपरा के लिए चर्चा में है।

जहाँ देश भर में होली का त्योहार रंगों, गुलाल और मिठाइयों के साथ मनाया जाता है, वहीं राजस्थान के उदयपुर जिले का एक छोटा सा गांव मेनार अपनी अनोखी परंपरा के लिए चर्चा में है।

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जहाँ देश भर में होली का त्योहार रंगों, गुलाल और मिठाइयों के साथ मनाया जाता है, वहीं राजस्थान के उदयपुर जिले का एक छोटा सा गांव मेनार अपनी अनोखी परंपरा के लिए चर्चा में है।

मेनार गांव इस मौके पर एक अलग ही रंग में डूबा नजर आता है। यहाँ रंगों की जगह गोला-बारूद से होली खेली जाती है, और रात भर तोपों की गर्जना के बीच वीरता का उत्सव मनाया जाता है। इस परंपरा को “बारूद की होली” के नाम से जाना जाता है, जो सैकड़ों सालों से मेनार की पहचान बनी हुई है।”बारूद की होली” के नाम से मशहूर इस अनोखी परंपरा में न तो पिचकारी चलती है, न ही गुलाल उड़ता है, बल्कि रात भर गोलियों की बौछार और तोपों की गर्जना गूंजती है।

हर साल होली के अगले दिन या तीसरे दिन, जिसे स्थानीय भाषा में “जमरा बीज” कहा जाता है, मेनार गांव एक अनूठे रंग में रंग जाता है। यहाँ के ग्रामीण पारंपरिक परिधानों में सज-धज कर चौपाल पर इकट्ठा होते हैं। पुरुष तलवारें और बंदूकें लिए नजर आते हैं, और रात के अंधेरे में हवा में गोलियों की बौछार शुरू हो जाती है। साथ ही, तोपों से गोले दागे जाते हैं, जिनकी गूंज मीलों तक सुनाई देती है। इस रोमांचक माहौल में महिलाएँ भी पीछे नहीं रहतीं। वे निडर होकर वीर रस से भरे गीत गाती हैं, जो इस उत्सव को और भी जीवंत बना देता है।रात के सन्नाटे को चीरती तोपों की आवाज और हवा में गूंजती गोलियों की तड़तड़ाहट इस उत्सव को किसी युद्ध के मैदान जैसा बना देती है। रात भर चलने वाली तोपों और गोलियों की आवाज़ के बीच गाए जाने वाले गीत इस बात का सबूत हैं कि मेनार के लोगों के दिल में आज भी वीरता और निडरता जिंदा हैं।

स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार, यह परंपरा करीब 400-500 साल पुरानी है और मेवाड़ के गौरवशाली अतीत से जुड़ी है। किवदंती है कि मुगल काल में जब मेनार पर हमला हुआ, तो गाँव के वीर योद्धाओं ने दुश्मनों को अपनी शक्ति और साहस से खदेड़ दिया। उस विजय के जश्न के रूप में शुरू हुई यह बारूद की होली आज भी उसी जोश के साथ मनाई जाती है। यहाँ के निवासी इसे अपनी सांस्कृतिक धरोहर और वीरता के प्रतीक के रूप में देखते हैं।
इस अनोखे उत्सव का आकर्षण अब सिर्फ मेनार तक सीमित नहीं रहा। देश-विदेश से पर्यटक और यहाँ के मूल निवासी, जो विदेशों में बसे हैं, इस परंपरा को देखने के लिए लौटते हैं। रात भर चलने वाली तोपों और गोलियों की आवाज़ के बीच गाए जाने वाले गीत इस बात का सबूत हैं कि मेनार के लोगों के दिल में आज भी वीरता और निडरता जिंदा है। मेनार की यह बारूद की होली न केवल एक त्योहार है, बल्कि इतिहास, साहस और एकता का एक जीवंत उत्सव है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। इस बारूद की होली का नजारा इतना रोमांचक है कि देश-विदेश से पर्यटक और विदेशों में बसे मेनार के मूल निवासी भी इसे देखने के लिए यहाँ आते हैं। रात भर चलने वाले इस उत्सव में सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा जाता है, ताकि परंपरा के साथ-साथ सभी की जान-माल की रक्षा हो सके। मेनार की यह अनूठी होली न केवल एक उत्सव है, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर का एक ऐसा रंग है, जो बारूद की गंध और वीरता के स्वरों से रंगा हुआ है। तो अगली बार होली की योजना बनाएँ, तो मेनार की इस “बारूद की होली” को जरूर देखें—जहाँ रंगों की जगह गोलियाँ बोलती हैं और तोपें ताल ठोकती हैं।

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