Home राज्य गड्ढे, गंदगी, गर्द और गंध के आईने में झांकता मैं गुलाबी शहर यानी मैं ही जयपुर हूं!

गड्ढे, गंदगी, गर्द और गंध के आईने में झांकता मैं गुलाबी शहर यानी मैं ही जयपुर हूं!

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सड़क की खोज में सुबह से निकला और शाम को जब वापस लौटा तो मेरे चेहरे पर धूल थी, आंखों में जलन और दिल में मायूसी के साथ मैंने जयपुर शहर को स्वच्छता एवं स्मार्ट सिटी की बदहाली के आईने में झांकते हुए पाया। 5 साल से अधिक समय तक बजट को खुर्द बुर्द करती रही सरकारें और प्रधानमंत्री के स्वच्छ राजस्थान के सपने को तोड़ती रहीं सरकारें।

मैं जूझता रहा शहर की हर सड़क के हर कोने में लोगों से स्मार्ट सिटी का अर्थ और हालात का अनुभव बांटने तो देखा कि गड्ढों में रोड ढूंढते लाचार लोग हिचकोले खाते गढ्ढों की तरफ इशारा करते हुए मानो कहे रहे थे-
“बचा लो मुझे इन भ्रष्ट लुटेरों से,
मैं शहर हूं बेबस तुम्हारे वतन का”!

यही है स्मार्ट सिटी और कच्ची मिट्टी के कट्टों से बनी सड़कों का शहर।

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सड़कें बदहाल और कच्ची मिट्टी से भरे कट्टों, पत्थर, गंदगी और रंग-बिरंगे प्लास्टिक की पन्नियों के ऊपर गायों और सांडों के बीच सफेद चादर बिछाकर बैठे प्रशासन को जब मैंने देखा तो ऐसा लगा कि प्रधानमंत्री मोदी जी की ऐतिहासिक परियोजना “स्वच्छ भारत और स्मार्ट सिटी” के सपने को कहीं हम धूल धूसरित तो नहीं कर रहे?
एक ओर जहां चंडीगढ़ और इंदौर जैसे शहर स्मार्ट सिटी और स्वच्छता के परचम लहराते हुए विश्व पटेल पर सफलता के गीत गा रहे हैं वहीं हम राजस्थान की राजधानी जयपुर के बीचों-बीच ‘पधारो म्हारे देश’ के बजाय ‘ गढ्ढों, गंदगी और गोबर के बीच ‘गोबरिया गोबरिया’ गा रहे हैं।

हर चौराहे पर गड्ढे, धूल और सड़क पर बैठी गायों की मीटिंग देखकर मुझे लगा कि शायद गंदगी के ऊपर सफेद चादर बिछाकर हम स्मार्ट सिटी और स्वच्छत भारत जैसे ऐतिहासिक अभियान को तबाह करने की योजनाएं बना रहे हैं।

स्मार्ट सिटी की और स्वच्छ भारत की प्रतिबद्धता के शिगूफों की बड़ी-बड़ी खबरों को मैंने जब अखबारों में देखा तो मेरी आंखे डबडबा गईं। न आशा बची, न निराश सिर्फ निर्वात शून्यता थी मेरे दिल में और दिमाग में भी।
इंटरनेशनल डिजिटल डिप्लोमेट एवं प्रोफेसर, साइंटिस्ट होने के नाते में साल में 1 महीने के लिए भारत आता हूं ताकि स्वच्छता अभियान को जन-जन तक पहुंचाने में कुछ मदद कर सकूं। 60 से अधिक देशों की यात्रा में मैंने देखा कि गरीब से गरीब देश भी अनुशासन है और स्वच्छता के साथ कोई समझौता नहीं करता मगर हम हैं कि पता नहीं कहां जा रहे हैं और किधर जा रहे हैं।

देश के प्रधानमंत्री ने जिस स्वच्छता अभियान को जन-जन तक पहुंचाने की ऐतिहासिक कोशिश की उसको दूसरे देशों ने सराहा भी और उसकी विजय गाथा कई शहर गा भी रहे हैं मगर हम हैं कि जयपुर के आंसुओं में स्वच्छता और स्मार्ट सिटी मिशन में गढ्ढों के बीच सड़क ढूंढ रहे हैं ।

स्मार्ट सिटी के कचरा निष्पादन के मापदंड के अनुसार सूखा एवं गीले कचरे की व्यवस्था अलग-अलग डब्बों में होनी चाहिए और फिर उसका डिस्पोजल एवं रीसाइकलिंग भी अलग-अलग प्लांट में होने चाहिए।
मगर जयपुर में सब कुछ नदारत है सिर्फ सरकारी बजट काली एवं सफेद जेबों में डिस्पोजल हो रहा है।
ज्ञात रहे कि पूरे शहर में इलेक्ट्रॉनिक कचरे में विद्यमान कैडमियम क्रोमियम मरकरी एवं लैड जैसे टॉक्सिक मटेरियल भारी बारिश के दौरान हमारे पीने के पानी के स्रोतों यानी बांध तालाब नदी एवं अंडरग्राउंड वॉटर रिसोर्सेस में मिक्स हो चुके हैं जो आने वाली पीढ़ी को बीमारी की गर्त में धकेलने के लिए पर्याप्त हैं।

मैं कल राज्य स्तरीय 68वीं फुटबॉल प्रतियोगिता के उद्घाटन कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिए सैंपऊ तहसील गांव तसीमो पहुंचा जहां पर राज्य के खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित।
सभी लोगों को स्वच्छता की शपथ दिलाई और कहा कि अगर देश को स्वच्छ रखना है तो खेलों को हमें स्वच्छता से जोड़ना चाहिए ताकि स्वच्छता का यह संदेश बच्चों युवाओं एवं खिलाड़ियों के माध्यम से जन-जन तक पहुंच सके।

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