अमिताभ कांत का कॉलम:धरोहरों की सुरक्षा जरूरी, बशर्ते उसके उपाय सही हों
भारत का विरासतों के संरक्षण का फ्रेमवर्क बहुत भारी-भरकम, रूखा और प्रतिकूल असर डालने वाला है। यह न तो अतीत को संरक्षित कर पा रहा है, न देश के भविष्य को आगे बढ़ने दे रहा है। इसका कारण 1958 का ‘प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल व अवशेष अधिनियम’ है। यह कानून देश के लगभग 3700 संरक्षित स्मारकों पर एक ही जैसे नियम लागू करता है- यह कि हर स्मारक के चारों ओर 100 मीटर का प्रतिबंधित क्षेत्र हो, जहां कोई निर्माण नहीं हो सकता और 200 मीटर का और नियंत्रित क्षेत्र हो, जहां विकास कार्यों पर कड़ा नियंत्रण होता है। बेहद सख्त लगने वाला यह फ्रेमवर्क असल में प्रभावहीन है। यह तमाम स्मारकों को एक जैसे नियमों में बांधता है, जबकि संरक्षण के लिहाज से बहुत कम फायदेमंद है। इसकी आर्थिक-सामाजिक लागत भी बहुत अधिक है। भारत में संरक्षित स्थलों की सूची असामान्य तरीके से विविधता भरी है। इनमें वैश्विक महत्व के स्थलों से लेकर छोटे-मोटे अवशेष तक हैं। कुछ तो औपनिवेशिक काल से चली आ रहीं कब्रें और कब्रस्तान हैं। सौ से ज्यादा तो ‘कोस मीनारें’ हैं, जो दूरी मापने के चिह्न थे। कुछ ‘संरक्षित स्थल’ असल में चलायमान वस्तुएं हैं, जबकि कुछ कागजों पर हैं। पर सभी पर वही 300 मीटर वाला प्रतिबंध लागू होता है। यह तरीका यदि सच में संरक्षण को बेहतर करता तो इसकी हिमायत की जा सकती थी। लेकिन व्यावहारिकता में यह बिल्कुल उलट है। एक समान प्रतिबंध स्मारकों के आसपास से गतिविधियां खत्म नहीं करता, बल्कि उन्हें अवैध बना देता है। कई स्मारकों के समीप ऐसे निर्माण याद कीजिए, जिनका ढांचा स्मारकों की दीवार तक पहुंच जाता है। यही अतिक्रमण किसी भी नियंत्रित विकास से ज्यादा नुकसान स्मारकों को पहुंचाता है। इधर, औपचारिक विकास पर रोक के कारण आसपास कोई सार्थक आर्थिक गतिविधि भी नहीं पनप पाती। इससे वो राजस्व स्रोत भी खत्म होते हैं, जो असल में इन विरासतों को बनाए रखते हैं। मसलन, कैफे, छोटे व्यापार, सांस्कृतिक आयोजन। नतीजतन, स्मारकों का उचित रखरखाव नहीं हो पाता और वे धीरे-धीरे खराब होते जाते हैं। पर्यटन के लिए भी यह उतना ही नुकसानदायक है। आप स्मारकों पर ऐसे नियम थोप दो तो फिर हैरिटेज टूरिज्म अलग से नहीं पनप सकता। पर्यटकों के लिए आधारभूत ढांचा और बुनियादी सुविधाएं जरूरी होती हैं। लेकिन देश में बहुत से स्मारकों में यह नदारद हैं। प्रतिबंधों के कारण वहां सम्पर्क-सड़क, पार्किंग, सेनिटेशन, लाइटें और जन-सुविधाएं तक बनाना कठिन होता है। इसीलिए कई स्थलों पर तो पहुंचना ही दूभर है। इसके विपरीत, रोम के कोलोजियम, पेरिस के एफिल टावर और लंदन के ऐतिहासिक स्थलों को प्रतिबंधों के बजाय डिजाइन कंट्रोल, इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ सामंजस्य, व्यापारिक गतिविधियों और सार्वजनिक स्थानों के जरिए घने शहरी माहौल से जोड़ा गया है। इसलिए अकेले एफिल टावर पर आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या भारत के सभी संरक्षित स्मारकों की मिली-जुली संख्या से चार गुना अधिक है। यह नियम रोजमर्रा के जीवन की गुणवत्ता और गरिमा को भी प्रभावित करता है। शहरों में पूरे के पूरे इलाके इन नियमों में फंसे हुए हैं। महज मरम्मत की अनुमति में पांच साल तक लग जाते हैं। पुणे के शनिवारवाड़ा के आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि प्रतिबंध के चलते वे जर्जर घरों में रहने को मजबूर हैं। मेट्रो कॉरिडोर, अस्पतालों का विस्तार और अन्य शहरी ढांचा विकास योजनाएं भी नियमों में उलझकर वर्षों तक अटकी रहती हैं। आगरा में मंजूरियां नहीं मिलने से स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में बुनियादी सुविधाओं के काम अटक गए। कर्नाटक में मदिकेरी किले के प्रतिबंधित क्षेत्र में आने के कारण जिला अस्पताल में क्रिटिकल केयर सुविधा का काम अटक गया। दिल्ली और कोलकाता मेट्रो के कार्यों में भी ऐसी ही बाधाएं आईं। इससे लागत बढ़ती है, जनता को सेवा समय पर नहीं मिलती और आर्थिक अवसर खो जाते हैं। इसका सबसे बड़ा असर उस विशाल जमीन के तौर पर दिखता है, जो इस व्यवस्था में लॉक हो चुकी है। भारतीय शहरों में अनुमानत: करीब 20 लाख करोड़ रुपए की जमीन इन प्रतिबंधित क्षेत्रों में अटकी हुई है। अकेली दिल्ली में करीब 8.7 लाख करोड़ रुपए की करीब 16 हजार एकड़ जमीन इन नियमों में फंसी है। बेहद महंगी और कम शहरी जमीन वाले देश में यह व्यवस्था आपूर्ति को बाधित करती है, कीमतें बढ़ाती है और अंतत: विकास को रोकती है। विरासत-संरक्षण का हमारा यह मौजूदा तरीका इस गलत अनुमान पर आधारित है कि सिर्फ दूरी से ही सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)