एन. रघुरामन का कॉलम:वहां खोदने का फैसला लें, जहां कोई और नहीं खोदता
उनकी उपलब्धि शायद "माउंटेन मैन' दशरथ मांझी जितनी बड़ी न हो, जिनके बारे में ज्यादातर लोगों ने सुना होगा। लेकिन उनका जज्बा वही था। साल 2024 तक, शकुंतला चतर (35) को ओडिशा के चंदका-डम्पड़ा वन्यजीव अभयारण्य में जंगली जानवरों, खासकर हाथियों से भरे जंगल के बीच कम से कम एक घंटे पैदल चलना पड़ता था। वह भी ऐसा पानी लाने, जो पीने लायक नहीं था। इसी तरह, 2016 तक महाराष्ट्र के वाशिम जिले के कालमेश्वर गांव के मजदूर बाबूराव ताजने को पानी की किल्लत झेलनी पड़ी। जब उनके पथरीले इलाके में पानी की कमी हुई और बोरवेल सूख गए, तो उनकी पत्नी एक कम पानी वाले कुएं पर गईं। वहां उन्हें पानी भरने से मना कर दिया गया और उनका अपमान किया गया। शकुंतला और बाबूराव ने फिर वह किया जिसकी हिम्मत इलाके में किसी और ने नहीं की। उन्होंने खुद कुआं खोदने का फैसला लिया, वह भी बिना अनुभव के। दोनों को कोई मदद नहीं मिली, सिवाय शकुंतला के, जिन्हें कभी-कभी पति लादूराम चतर और पड़ोसी जगन्नाथ तिंगुआ से मदद मिल जाती थी। ज्यादातर लोगों को लगा, दोनों पागल हैं। बाबूराव ने सुबह जल्दी खुदाई शुरू की, चार घंटे काम किया और फिर मजदूरी पर चले गए। काम से लौटकर उन्होंने फिर दो घंटे खुदाई की। वहीं, सरकारी प्राथमिक विद्यालय में मिड-डे मील बनाने वाली शकुंतला ने रोज चार घंटे, अपनी जमीन पर कुआं खोदना शुरू किया। जब दस फीट खोदने पर पानी नहीं मिला, तो बाहरी लोगों ने उन्हें गड्ढों में फंसे पागल कहा। खुदाई के 30 दिनों में शकुंतला 25 फीट तक पहुंचीं, वहीं बाबूराव 10 फीट तक क्योंकि जमीन पथरीली थी। दोनों को पानी नहीं मिला। यह "खुदाई का अंधकारमय दौर' था। यदि वे थककर 25 या 10 फीट पर रुक जाते, तो वे केवल पानी निकालने में ही विफल नहीं होते, बल्कि उनकी पूरी मेहनत बेकार जाती। गहराई में जाने के लिए इस विश्वास की जरूरत है कि पानी मिलेगा, भले ही जमीन सूखी दिखे। दोनों और गहराई में गए। शकुंतला को 40 फीट पर पानी मिला और बाबूराव को 15 फीट पर। शकुंतला को 60 दिन लगे, जबकि बाबूराव ने इसे 40 दिनों में कर दिखाया। सबसे खूबसूरत बात यह है कि इन कुओं ने केवल खोदने वालों की ही नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की सेवा की। आज वे अपने क्षेत्र के हीरो हैं। करियर भी अकसर ऐसा ही होता है। 1. आप "सतह पर तैरते हैं,' जो भी नौकरी मिली, उसे किया और फिर उथली रुचि के साथ दूसरी की ओर बढ़ गए। या फिर 2. आप बिना किसी तत्काल "पुरस्कार' (प्रसिद्धि, उच्च वेतन या पद) के वर्षों अध्ययन, अभ्यास और देर तक काम करते हैं। एक "गहरा' करियर तब शुरू होता है जब आप किसी खास "प्यास' (किसी उद्योग की समस्या या अपने कौशल में कमी) को पहचानकर, उस जगह तब तक खुदाई करते हैं जब तक विशेषज्ञता के जलस्तर तक नहीं पहुंच जाते। एक "उथला' करियर केवल खुद को बचाए रखने यानी वेतन पाने के लिए होता है। एक "गहरा' करियर "योगदान' के स्तर तक पहुंचता है। एक बार जब आपने महारत हासिल कर ली (पानी तक पहुंच गए), तो आप दूसरों के लिए ‘संसाधन’ बन जाते हैं। आपकी विशेषज्ञता ऐसा "कुआं' बन जाती है, जहां सहकर्मी, जूनियर और पूरा उद्योग मदद के लिए आता है। फंडा यह है कि असर, सतह पर नहीं मिलता। यह लगातार प्रयास के बाद गहराई में मिलता है। कम से कम पानी और करियर के मामले में तो ऐसा ही है। इसलिए, अपने कार्यक्षेत्र के लिए "कुआं खोदने वाले' की विचारधारा अपनाएं।