एन. रघुरामन का कॉलम:समस्या से बचें नहीं, सामना करें, कौन जाने आप ही समाधान खोज लें
दूसरों के बारे में तो मुझे नहीं पता, लेकिन मेरे परिवार को हाल ही में घरेलू मोर्चे पर एक समस्या झेलनी पड़ी। हमारे घर में काम करने वाले लोग गांव चले गए। यह हर साल का रिवाज है, किन्तु उनकी जगह काम करने वाला कोई आसानी से मिल जाता है। लेकिन इस बार कोई नहीं मिला। इसकी वजह राज्य चुनाव और शादी का सीजन बताया गया। तब मेरी पत्नी ने रोम्बा का सहारा लिया- झाड़ू-पोंछा करने वाला रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर। उसके काम से प्रभावित होकर मैंने खोजा कि इसे किसने बनाया। ये 58 साल की हेलन ग्रेनर थीं। रोबोटिक्स में ग्रेनर की दिलचस्पी तब शुरू हुई, जब उन्होंने 10 साल की उम्र में ‘स्टार वार्स’ फिल्म देखी और उसके किरदार आर2-डी2 से बेहद प्रभावित हो गईं। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएट और कंप्यूटर साइंस में मास्टर्स हेलन ने मशहूर रोम्बा को को-क्रिएट किया। इसे 2002 में लॉन्च किया गया और यह पहला बेहद सफल कॉमर्शियल घरेलू रोबोट बन गया। आज रोम्बा हमारे कमरे में बैठा रहता है और काम पर लग जाने के लिए हमारे कमांड का इंतजार करता है। उसने पूरे घर का नक्शा याद कर लिया है- वो ‘नो-गो जोन’ भी, जहां उसे जाने की अनुमति नहीं है। सामान्य टू-बेडरूम हाउस में वह 45 मिनट से भी कम समय में बिना किसी निगरानी के सिर्फ वॉइस कमांड पर झाड़ू-पोंछा कर सकता है। महिलाओं से अपेक्षा की जाती रही है कि वे न सिर्फ परिवार के खाने और कपड़ों का काम संभालें, बल्कि घर को साफ रखने समेत कई अन्य कामों में शारीरिक मेहनत भी करें। ऐसे कई काम थे, जो रोज घंटों की मेहनत मांगते थे और घरेलू जीवन को नीरस बना देते थे। इसीलिए कई महिलाएं ऐसे आविष्कारों के लिए प्रेरित हुईं, जो उनका समय बचा सकें। सबसे ज्यादा कमर तोड़ने वाला काम है बर्तन धोना। हालांकि डिशवॉशिंग मशीनें पहले से मौजूद थीं, लेकिन 1883 में जोसेफिन कोक्रेन के पति की मौत हो गई और वे कर्ज में डूब गईं। पहले से मौजूद डिशवॉशिंग मशीनों में ब्रश और स्क्रबर का इस्तेमाल होता था, जिनसे ठीक सफाई नहीं होती और क्रॉकरी को नुकसान भी पहुंचता था। यह मशीन भी ठीक उनके सर्वेंट जैसा ही परिणाम देती थी। तब उन्होंने कहा कि ‘अगर कोई और डिशवॉशिंग मशीन नहीं बनाएगा, तो मैं खुद बनाऊंगी।’ उन्होंने ऐसी मशीन डिजाइन की, जिसमें धातु की रैक में रखे बर्तनों को धोने के लिए मोटर से चलने वाले पहिए और हॉट-वॉटर प्रेशर का उपयोग होता था। दिसंबर 1886 में उन्हें अपने आविष्कार के लिए पेटेंट मिला और यही खोज आधुनिक डिशवॉशर्स के मानक डिजाइन का आधार बनी। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि लगभग हर घर की रसोई का सबसे आम साथी रेफ्रिजरेटर भी महिलाओं की ही देन है। पहले ज्यादातर लोग आइस बॉक्स इस्तेमाल करते थे, जिसमें लगातार पिघला हुआ पानी निकालने की समस्या थी। महिलाओं को खाना खराब होने से बचाने के लिए पकाने और इसे स्टोर करने की योजना बनानी पड़ती थी। दरअसल, आप और हम जो इलेक्ट्रिक रेफ्रिजरेटर आज इस्तेमाल करते हैं, उसका पेटेंट 1914 में एक महिला स्टेनोग्राफर फ्लोरेंस परपार्ट ने कराया था। ऐसा करने वाली वे पहली महिला नहीं थीं। फ्रेड डब्ल्यू वुल्फ ने 1913 में इलेक्ट्रिक रेफ्रिजरेटर का पेटेंट कराया, जिसमें इलेक्ट्रिक रेफ्रिजरेटर आइस बॉक्स के ऊपर रखा जाता था। लेकिन फ्लोरेंस ने इसे पूरी तरह मैकेनाइज्ड कर फ्रंट ओपनिंग कैबिनेट लगाया, जिससे उनके लिए खाना रखना और निकालना काफी आसान हो गया। दिलचस्प यह है कि जब महिलाओं को पेटेंट नहीं दिए जाते थे तो पेंसिल्वेनिया के थॉमस मास्टर्स ने कॉर्न प्रोसेसिंग मशीन का पेटेंट कराया, जबकि यह आविष्कार उनकी पत्नी सिबिला मास्टर्स ने किया था। 1715 तक हाथ से मक्का पीस कर आटा बनाना समय लेने वाला और कठिन कार्य था। इसीलिए सिबिला ऐसी मशीन बनाने के लिए प्रेरित हुईं। ऐसी सैकड़ों चीजें हैं, जिन्हें मैकेनाइज करने में महिलाओं ने योगदान दिया। चाहे वह मार्गरेट ई. नाइट की फ्लैट बॉटम पेपर बैग मशीन हो, सारा बून का बेहतर आयरन बोर्ड हो या मैरियन ओ ब्रायन डोनोवान का वॉटरप्रूफ डायपर कवर। फंडा यह है कि समस्या का सामने से मुकाबला करें, कौन जाने अगले आविष्कारक आप ही हों।