एन. रघुरामन का कॉलम:सेहतमंद खाना बार-बार की बीमारी और अस्पतालों के चक्करों से बचाता है

May 25, 2026 - 06:05
एन. रघुरामन का कॉलम:सेहतमंद खाना बार-बार की बीमारी और अस्पतालों के चक्करों से बचाता है
कुछ महीने पहले जब मेरी पत्नी अस्पताल में थीं तो साथ बैठकर हम पूर्वजों के बारे में बात कर रहे थे कि वे लोग बहुत कम या शायद ही कभी डिस्पेंसरी गए हों। अपनी ग्रेट-ग्रैंडमदर से लेकर बाकी बुजुर्गों के जीवित रहने तक मुझे याद नहीं कि मैं कभी उन्हें डिस्पेंसरी या अस्पताल लेकर गया। हम उनके खानपान की आदतों के बारे में और इस विषय पर चर्चा कर रहे थे कि पेट को अकसर ‘सेकंड ब्रेन’ कहा जाता है। इसमें शरीर की करीब 70-80% रोग प्रतिरोधी कोशिकाएं होती हैं और यह सभी बीमारियों के खिलाफ प्राथमिक सुरक्षा तंत्र की तरह काम करता है। आंतों में मौजूद खरबों बैक्टीरिया का इकोसिस्टम ‘गट माइक्रोबायोम’ रोगाणुओं से लड़ने और जलन व सूजन को नियंत्रित करने के लिए सीधे आपके रोग प्रतिरोधी तंत्र से जुड़ा होता है। आखिरकार हमें एहसास हुआ कि स्वस्थ पेट हमारी प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली मजबूत बनाता है, बार-बार होने वाली बीमारी से बचाता है और हमें अस्पताल के कम चक्कर लगाने पड़ने हैं। यहां हमारे पूर्वजों की कुछ आदतें हैं, जिन्हें लेकर विशेषज्ञ भी कहते हैं कि सेहतमंद रहने के लिए इन्हें अपनाना चाहिए। नाश्ता कभी मिस न करें: मैं यह सुनते हुए बड़ा हुआ हूं कि ‘घर से निकलने से पहले कुछ खा लो, पता नहीं अगला खाना कब मिले।’ यही बात अब नाश्ते का नियम बन गई है। उस समय लोग भरपेट खाना खाते थे। भोजन और ऑफिस जाने के लिए तैयार होने के बीच में मेरे ग्रैंडफादर 20 मिनट टहलते थे। खासकर उन दिनों, जब कावेरी में पानी का बहाव तेज होता था। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें तैर कर तीन नदियां पार करने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती थी। वे तमिलनाडु के उमायालपुरम गांव में काम करते थे और गांव के पास कावेरी तीन धाराओं में बंट जाती है। उन दिनों सार्वजनिक परिवहन बहुत कम था। वे जानते थे कि भरे पेट तेज बहाव में तैरना सही नहीं होता। आज के विशेषज्ञ भी कहते हैं, ‘नाश्ता कभी मत छोड़िए।’ मुझे इन दोनों बातों में गहरा तालमेल दिखता है। फल,सब्जियां छिलके समेत खाएं: आपको याद हो तो केले जैसे फल को छोड़ कर हमारे बुजुर्ग ज्यादातर फल छिलके समेत खाते थे। केले के छिलके बैकयार्ड में गाय को देते थे। बेशक कुछ फल अपवाद भी हैं, लेकिन कई फलों और सब्जियों तक के छिलके खाए जा सकते हैं- जैसे गाजर, चुकंदर और आलू। अत्यधिक फाइबर लेने की कोशिश न करें: अमीर देशों में भी लोग 30 ग्राम प्रतिदिन जैसी रिकमंडेड गाइडलाइन से कम ही फाइबर रोजाना लेते हैं। फाइबर को प्रोटीन की तरह नहीं लेना चाहिए, जिसे हम किसी भी खाने में बड़ी मात्रा में शामिल कर देते हैं। इससे पेट गड़बड़ा जाएगा। अलग-अलग चीजों में थोड़ा-थोड़ा फाइबर लेना चाहिए। थोड़ा फाइबर मेवों और फलों से मिल जाता है। आलू के छिलके में उसके भीतरी हिस्से की तुलना में तीन गुना फाइबर होता है। डॉ. एमिली लीमिंग अपनी नई किताब ‘फाइबर पावर’ में लिखती हैं कि फ्लैक्स सीड्स, चिया सीड्स और हेम्प सीड्स फाइबर बूस्टर्स होते हैं। वे किंग्स कॉलेज लंदन में एक वैज्ञानिक और न्यूट्रिशन, लाइफस्टाइल व गट माइक्रोबायोम की रिसर्चर हैं। बची हुई गाजर, बीन्स और हर्ब्स से एक स्वादिष्ट हाई-फाइबर डिप बना कर डाइनिंग टेबल पर रखा जा सकता है, ताकि बच्चे इसे एक से दूसरे कमरे में जाते हुए खा सकें। डिनर शाम 6 बजे कर सकते हैं: मेरे ग्रैंडफादर शाम 6 बजे से पहले या बाद में खाना नहीं खाते थे। उनका समय तय था। वे हमेशा कहते थे कि यह ‘ईटिंग विन्डो’ की बात है, ताकि सोने से पहले आपके शरीर को खाना पचाने का समय मिल सके। इसके अलावा अगर रोज एक ही समय पर खाना खाएं तो शरीर इस रूटीन को याद रखता है और आपके माइक्रोब्स समझ जाते हैं कि खाना पचाने की तैयारी कब करनी है। फंडा यह है कि समय पर और हेल्दी खाना खाने से आप सेहतमंद जीवन जीते हैं। क्यों न हम भी उसी गट हेल्थ को फिर से पाने के लिए हमारे माता-पिता, ग्रैंडपैरेंट्स और ग्रेट-ग्रैंडपैरेंट्स की कुछ अच्छी आदतें अपनाने की कोशिश करें?