कौशिक बसु का कॉलम:कुछ लोकतंत्र क्यों सफल होते हैं और कुछ क्यों नहीं?

May 5, 2026 - 06:05
कौशिक बसु का कॉलम:कुछ लोकतंत्र क्यों सफल होते हैं और कुछ क्यों नहीं?
लोकतंत्र में कई जटिलताएं निहित हैं। इसके मूल में यह कठिनाई है कि निजी पसंद को सुसंगत सामाजिक निर्णय में कैसे बदलें? नोबेल विजेता अर्थशास्त्री केनेथ एरो ने इसे इम्पॉसिबिलिटी-थियोरम बताया था। बाद में एक अन्य नोबेल विजेता अमर्त्य सेन ने अपनी पुस्तक ‘कलेक्टिव चॉइस एंड सोशल वेलफेयर’ में इस विचार को और विकसित किया। अतीत में यूक्लिड ने ज्यामिति के लिए जो किया था, वही एरो और सेन ने राजनीतिक अर्थशास्त्र के लिए किया और इस प्रक्रिया में सामूहिक निर्णयों की सीमाओं को उजागर किया। हालांकि समय के साथ लोकतंत्र की सैद्धांतिक समझ बढ़ी है, लेकिन उसका अनुभवजन्य विश्लेषण पिछड़ता चला गया है। सुसंगत आंकड़ों के अभाव में यह समझ कि कुछ लोकतंत्र क्यों सफल होते हैं और कुछ क्यों विफल, अकसर प्रमाण के बजाय पूर्वग्रहों से बनती है। इस कमी को दूर करने के लिए स्वीडन का वी-डेम इंस्टिट्यूट अपनी वार्षिक ‘डेमोक्रेसी रिपोर्ट’ प्रकाशित करता है, जो दुनिया के देशों में लोकतंत्र की हालत का जायजा लेने के बेहतर प्रयासों में से एक है। संस्थान की नवीनतम रिपोर्ट अमेरिका की वर्तमान दिशा का गंभीर आकलन प्रस्तुत करती है। यह चेतावनी देती है कि जिस गति से अमेरिकी लोकतंत्र का विघटन हो रहा है, वह आधुनिक इतिहास में अभूतपूर्व है। दुनिया के प्रमुख लोकतंत्र के रूप में अमेरिका का जो दबदबा है, उसे देखते हुए इस प्रकार की गिरावट उसकी सीमाओं से बाहर भी व्यापक प्रभाव डालती है। यह रिपोर्ट पश्चिमी यूरोप में भी तीव्र गिरावट की ओर संकेत करती है, जहां लोकप्रियतावादी नेता ट्रम्प से सबक ले रहे हैं। यकीनन, लोकतंत्र को मापने का कोई भी प्रयास आलोचना के लिए खुला होता है, विशेषकर इसलिए कि लोकतंत्र की कोई एक सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत परिभाषा नहीं है। फिर भी, वी-डेम इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट सम्भवतः सबसे परिश्रमपूर्वक प्रयासों में से एक है। यह ऐसे इंडिकेटर्स का आकलन करती है, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं की दृढ़ता को ट्रैक करते हैं और भिन्न-भिन्न राजनीतिक संस्कृतियों वाले देशों के मूल्यांकन में व्यक्तिगत पूर्वग्रह की गुंजाइश को सीमित करते हैं। आश्चर्य नहीं कि वी-डेम के 2026 सूचकांक में डेनमार्क, स्वीडन और नॉर्वे शीर्ष पर हैं, जबकि एरीट्रिया, उत्तरी कोरिया और म्यांमार सबसे नीचे। रिपोर्ट एक निराशाजनक तस्वीर प्रस्तुत करती है। वो यह रेखांकित करती है कि 20वीं सदी के उत्तरार्ध की लोकतंत्रीकरण-लहर से हुए लाभ अब लगभग समाप्त हो चुके हैं। लेकिन यह कुछ उत्साहजनक घटनाक्रमों को भी सामने लाती है। उदाहरण के लिए, श्रीलंका में राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके के नेतृत्व में लोकतांत्रिक पुनरुत्थान देखा गया है। वहीं ब्राजील में लुला दा सिल्वा की 2022 की चुनावी जीत के बाद यह स्पष्ट हुआ है कि किसी देश में लोकतांत्रिक पतन की धारा को पलटा भी जा सकता है। इसके बावजूद, व्यापक ट्रेंड हमारे सामने स्पष्ट है। 1974 में पुर्तगाल की कार्नैशन रिवोल्यूशन से शुरू हुई प्रक्रिया- जिसे राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुअल हटिंग्टन ने लोकतंत्रीकरण की तीसरी लहर कहा था- ने दर्जनों देशों में लोकतंत्र का विस्तार किया। अब जब यह लहर पीछे हट रही है, तो लगभग पांच दशकों की लोकतांत्रिक प्रगति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। क्या इस प्रवृत्ति को उलटा जा सकता है? जैसा कि ब्रायन स्टेल्टर ने कहा है, दो संस्थागत उपकरण सबसे अधिक आशा प्रदान करते हैं- चुनाव, जो नागरिकों को सरकार बदलने की शक्ति देते हैं, और स्वतंत्र न्यायपालिका, जो कार्यपालिका के अतिक्रमण पर अंकुश लगाने का कार्य करती है। जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक ‘बियॉन्ड द इनविजिबल हैंड’ में कहा था, भू-राजनीतिक असमानताओं से आकार ग्रहण करने वाली एक परस्पर जुड़ी हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था में, प्रमुख देशों के नेता आम लोगों के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जितनी उनकी अपनी सरकारें। यह विशेष रूप से छोटे देशों के लिए सच है, जो आर्थिक या रणनीतिक रूप से बड़े देशों पर निर्भर हैं। यह समस्या कम गंभीर होती, यदि सरकारें अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करतीं। लेकिन शक्तिशाली देशों के पास कमजोर देशों पर दबाव डालने के अनेक तरीके होते हैं। यही कारण है कि वैश्विक लोकतांत्रिक शासन के स्वास्थ्य को मापना केवल राष्ट्रीय स्कोरों के जमा-जोड़ पर निर्भर नहीं हो सकता। इसमें यह भी शामिल होना चाहिए कि प्रमुख शक्तियां अपनी सीमाओं से परे अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित, सीमित और अतिक्रमित करती हैं। ऐसे मापदंड तैयार करना कठिन है, लेकिन इसके बिना, लोकतंत्र के बारे में हमारी समझ अधूरी ही रहेगी। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)