डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम:नई पीढ़ी की अच्छी हेल्थ हमारे निर्णयों से तय होती है

May 16, 2026 - 06:10
डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम:नई पीढ़ी की अच्छी हेल्थ हमारे निर्णयों से तय होती है
विज्ञान लंबे समय से यह मानता आया है कि जीन जीवन की आधारशिला हैं। लेकिन हाल के वर्षों में आए शोध सिद्ध करते हैं कि बच्चों का स्वास्थ्य केवल जीन से निर्धारित नहीं होता, बल्कि बच्चे के गर्भ में आने से पहले के माता-पिता के स्वास्थ्य और जीवनशैली से भी प्रभावित होता है। ब्रिटेन में हुई ‘एवन लॉन्गिट्यूडिनल स्टडी ऑफ पैरेंट्स एंड चिल्ड्रन (एएलएसपीएसी) ने कई महत्वपूर्ण तथ्य दिए हैं। इस पर आधारित और द लैंसेट चाइल्ड एंड अडोलेसेंट हेल्थ (2023) में प्रकाशित स्टडी में देखा गया कि शुरुआती जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियां बच्चों की जीन-अभिव्यक्ति को बदल सकती हैं। बीएमजे ओपन (2022) के अध्ययन ने गर्भावस्था के दौरान मांओं में तनाव को बच्चों में हृदय संबंधी जोखिमों से जोड़ा है। वहीं वेलकम ओपन रिसर्च (2023) ने पिता के स्वास्थ्य की बच्चों के स्वास्थ्य में भूमिका को रेखांकित किया है। बच्चे अपने माता-पिता से डीएनए प्राप्त करते हैं, जो मधुमेह, मोटापा, हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य जैसी स्थितियों की संभावना को प्रभावित करता है। लेकिन डीएनए की संरचना बदले बिना जीन कब और कितना सक्रिय होगा, यह प्रक्रिया भावी पैरेंट्स के पोषण, तनाव और जीवनशैली से प्रभावित होती है। यही कारण है कि प्री-कॉन्सेप्शनल हेल्थ- यानी गर्भधारण से पहले का स्वास्थ्य अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। इसका मतलब है कि अगर किसी माता-पिता को अपने होने वाले बच्चे का अच्छा स्वास्थ्य चाहिए तो उन्हें खुद पोषण, स्वस्थ वजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, नशे से दूरी और अच्छा मानसिक संतुलन बनाए रखना होगा। यह जिम्मेदारी महिलाओं-पुरुषों की समान रूप से है। शोध बताते हैं कि यदि पिता गर्भधारण से पहले धूम्रपान करते हैं, तो इससे बच्चों को मिलने वाले डीएनए में ऐसे बदलाव हो सकते हैं, जो अस्थमा, मोटापा और मेटाबोलिक रोगों का जोखिम बढ़ाते हैं। मातृ-धूम्रपान के प्रभाव और भी गंभीर हैं। ऐसे बच्चों में जन्म के समय कम वजन और आगे चलकर मोटापे की सम्भावना अधिक होती है। वैश्विक स्तर पर लगभग 14.4% महिलाएं और 27.5% पुरुष गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान करते हैं, जो इस समस्या की व्यापकता को दर्शाता है। इसी तरह, यदि माता-पिता का वजन अधिक है, तो बच्चों में मधुमेह और हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। यह केवल जीन का असर नहीं, बल्कि शरीर के भीतर बनने वाले जैविक संकेतों का भी परिणाम है, जो भ्रूण के विकास को प्रभावित करते हैं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, भारतीय शिशु अकादमी और भारत के प्रसूति एवं स्त्री रोग समाजों के महासंघ ने प्री-कॉन्सेप्शनल केयर को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में शामिल करने की सिफारिश की है। इनमें फोलिक एसिड सप्लीमेंट, एनीमिया, डायबिटीज और थायरॉइड की जांच, स्वस्थ जीवनशैली और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की बात कही गई है। प्री-कॉन्सेप्शनल हेल्थ के फायदे केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी हैं। इससे समय से पहले जन्म, कम वजन और जन्मजात विकारों का जोखिम कम होता है। दीर्घकाल में यह मधुमेह और हृदय रोग जैसी बीमारियों को कम करता है। इससे परिवारों का इलाज पर होने वाला खर्च घटता है और स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ कम होता है। भारत जैसे देश में- जहां गैर-संचारी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं- यह दृष्टिकोण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आज की जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों की जड़ें अकसर जीवन के शुरुआती चरणों में ही पड़ जाती हैं। यदि हम गर्भधारण से पहले ही स्वास्थ्य सुधार पर ध्यान दें, तो आने वाली पीढ़ियों को अधिक स्वस्थ बनाया जा सकता है। इसके बावजूद, हमारे स्वास्थ्य तंत्र में प्री-कॉन्सेप्शनल केयर अभी भी सीमित है। अधिकतर प्रयास गर्भावस्था या जन्म के बाद शुरू होते हैं, जबकि वास्तविक अवसर उससे पहले मौजूद होता है। हमें इस सोच को बदलना होगा और प्री-कॉन्सेप्शनल हेल्थ को सार्वजनिक स्वास्थ्य का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। शोध समाज की प्रगति के सहायक हो सकते हैं, बशर्ते उनको स्वास्थ्य नीतियों में शामिल किया जाए। विज्ञान का संदेश स्पष्ट है- जीन मंच तैयार करते हैं, लेकिन कहानी पर्यावरण लिखता है- हमारे व्यवहार और जीवनशैली के जरिए। आने वाली पीढ़ियों का स्वास्थ्य आज, हमारी गतिविधियों से तय हो रहा है। ऐसे में प्री-कॉन्सेप्शनल हेल्थ में निवेश केवल चिकित्सकीय आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है, जो स्वस्थ भविष्य की नींव रखती है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)