डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम:वो दवाइयां किस काम की, जिन्हें लोग खरीद नहीं सकते
हर कुछ सालों में कोई ऐसी दवा आती है, जिसे चिकित्सा विज्ञान की बड़ी उपलब्धियों में गिना जाने लगता है। फिलहाल कीट्रूडा (पेम्ब्रोलिजुमैब) नाम की नई दवा- जो कैंसर के इलाज के लिए बनी है- को बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। लेकिन इसने एक असहज करने वाली सच्चाई को भी उजागर किया है- क्या जीवन बचाने वाली दवाएं केवल उन लोगों के लिए हैं जो उनकी कीमत चुका सकते हैं? मर्क कंपनी द्वारा विकसित कीट्रूडा इम्यूनोथेरेपी की श्रेणी की दवा है। यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय कर कैंसर कोशिकाओं से लड़ने में मदद करती है। फेफड़ों के कैंसर, मेलेनोमा, सर्वाइकल और किडनी कैंसर सहित कई प्रकार के कैंसर में इसका उपयोग किया जा रहा है। लेकिन भारत में कीट्रूडा का इलाज इतना महंगा है कि एक साल का खर्च एक करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। एक-एक इंजेक्शन की कीमत लाखों में है। ऐसे में यह अधिकांश मरीजों की पहुंच से बाहर है। फिर कीट्रूडा पर पेटेंट संरक्षण होने के कारण अभी तक इसके सस्ते जेनरिक या बायोसिमिलर विकल्प बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। इससे दवा बनाने वाली कंपनी का एकाधिकार बना रहता है और कीमतों पर कोई प्रतिस्पर्धात्मक दबाव नहीं पड़ता। कंपनियों का तर्क है कि इतनी महंगी दवाओं की कीमत उनके शोध और विकास की लागत को पूरा करने के लिए जरूरी है, लेकिन जब यही दवा वैश्विक स्तर पर अरबों डॉलर का कारोबार कर रही हो, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कीमतें वास्तव में लागत पर आधारित हैं या बाजार की ताकत पर। भारत में स्थिति और जटिल हो जाती है, क्योंकि यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था अभी भी सीमित संसाधनों पर आधारित है। सरकारी योजनाएं भी इस तरह की महंगी दवाओं को नियमित रूप से कवर नहीं करतीं। निजी बीमा कंपनियां भी अक्सर इसकी पूरी लागत वहन नहीं करतीं। इसके अलावा, कीट्रूडा को अभी तक आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल नहीं किया गया है, जिससे इसकी कीमत पर सरकारी नियंत्रण भी सीमित है। परिणाम यह है कि इलाज की जरूरत और इलाज की उपलब्धता के बीच एक गहरी खाई बन जाती है। इस असमानता का एक खतरनाक परिणाम यह भी है कि कुछ मरीज सस्ती दवा की तलाश में गैरकानूनी या अनियमित बाजारों की ओर रुख करते हैं। इससे नकली या घटिया दवाओं का खतरा बढ़ जाता है, जो मरीजों की जान के लिए और भी बड़ा जोखिम बन सकता है। यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था की ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य नीति की विफलता को भी दर्शाती है। कीट्रूडा से जुड़ा यह विवाद केवल एक दवा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक नैतिक प्रश्न उठाता है- क्या जीवनरक्षक दवाओं को केवल एक व्यापारिक उत्पाद के रूप में देखा जाना चाहिए? क्या कंपनियों की जिम्मेदारी केवल इनोवेशन तक सीमित है या उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी दवाएं जरूरतमंदों तक पहुंच सकें? और सरकारों की भूमिका क्या होनी चाहिए? भारत के पास इस दिशा में कुछ नीतिगत विकल्प मौजूद हैं। जरूरत पड़ने पर अनिवार्य लाइसेंसिंग के जरिए सस्ती दवाओं का उत्पादन शुरू किया जा सकता है। सरकार दवा कंपनियों के साथ मूल्य-निर्धारण पर बातचीत कर सकती है या बड़े स्तर पर खरीद कर कीमत कम कर सकती है। सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का दायरा बढ़ाकर ऐसी दवाओं को शामिल किया जा सकता है। आने वाले वर्षों में जब पेटेंट समाप्त होगा, तब भारतीय कंपनियों द्वारा सस्ते विकल्प लाए जाने की उम्मीद भी है, लेकिन तब तक लाखों मरीजों के लिए इंतजार करना संभव नहीं है। एक और महत्वपूर्ण पहलू इस दवा के प्रचार-प्रसार से जुड़ा है। इसे चमत्कारी दवा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे मरीजों और उनके परिवारों में अत्यधिक उम्मीदें पैदा हो जाती हैं। जबकि सच्चाई यह है कि हर मरीज पर इसका असर समान नहीं होता। ऐसे में जरूरी है कि डॉक्टर और कंपनियां मरीजों को पूरी और संतुलित जानकारी दें, ताकि वे सही निर्णय ले सकें। यह मामला हमें सोचने पर मजबूर करता है कि चिकित्सा क्षेत्र में असली प्रगति क्या है। क्या केवल नई दवाएं विकसित करना ही प्रगति है, या यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि वे सभी तक पहुंच सकें? यदि जीवनरक्षक दवाएं कुछ लोगों तक सीमित रहेंगी, तो यह न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था, बल्कि सामाजिक न्याय की भी विफलता है। मेडिकल इनोवेशन का उद्देश्य केवल विज्ञान को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि समाज के हर व्यक्ति तक उसके लाभ को पहुंचाना भी होना चाहिए। यदि जीवनरक्षक दवाएं कुछ लोगों तक सीमित रहेंगी, तो यह न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था, बल्कि सामाजिक न्याय की भी विफलता है। मेडिकल इनोवेशन का उद्देश्य समाज के हर व्यक्ति तक उसके लाभ को पहुंचाना होना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)