नवनीत गुर्जर का कॉलम:जब गांव हमारे साथ होगा, जीवनशैली साधारण होगी तो चिंता भी कम होगी

May 14, 2026 - 06:05
नवनीत गुर्जर का कॉलम:जब गांव हमारे साथ होगा, जीवनशैली साधारण होगी तो चिंता भी कम होगी
पीढ़ियों के आंगन को चूल्हे में डालो! रसोई की मिठास, आस-पड़ोस के रिश्तों को टोकरी में रक्खो... और बच्चों को कमर में बांधकर चढ़ो किसी ऊंचे पुल या मीनार पर। शहर में महंगाई आई है! सोना आप खरीद नहीं सकते। तेल आप खर्च नहीं कर सकते। वर्क फ्रॉम होम आपको कोई दे नहीं रहा। आखिर करें तो क्या करें? होर्मुज जो आफत लाया है या लाने वाला है, हो सकता है वो विकट हो, लेकिन हम शहरों के लोग अब वापस गांव भी तो नहीं जा सकते! दरअसल, हमने अपनी दैनन्दिनी, अपना रहन-सहन इतना उलझा लिया है कि उससे बाहर निकलना अब मुश्किल है। दरअसल, हम जड़ों से कटे हुए लोग हैं। परिवार या कुल की बेल से टूटे हुए... और एक तरह से सूखे हुए पत्ते। दिनभर की आपाधापी के बाद कभी सुख में, कभी दु:ख में, मिनटों के लिए ही सही, एक कंधा तलाशते हैं। आंखों के कलश से गीला करने के लिए। हमें वह कंधा तक नसीब नहीं! तमाम सुखों की गंगा आस-पास बहती है। शहरों- महानगरों की सारी खुशियां घर में ही टिमटिमाती रहती हैं, लेकिन गांव की वो गुनगुनी धूप नहीं है, जो आंगन को घर से जोड़ने वाली सिड्डियों पर बैठकर मिलती थी। ...और वे सिड्डियां जिन पर शरारत करते कभी मां ने कान उमेठा था, पिता ने डांट पिलाई थी और इस सब के बाद दादी ने पल्लू में छिपाकर सारी आफतों से बचा लिया था, अब याद तक नहीं है। खुशियों की बरगद-सी छांह के बावजूद लगता है- हम गमलों में उगे हुए लोग हैं। कहने को यहां शहरों में हमारा अपना समाज है, धर्म है और हंसते-बोलते लोग भी हैं। लेकिन सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक मूल्य कांच के बर्तनों की तरह टूट गए हैं। ...और उनकी किरचें हमारे पैरों में चुभी हुई हैं। ये किरचें पैरों में सिर्फ दिखती हैं, दरअसल, ये हमारे माथे में चुभ गई हैं। हमारे बच्चे ऊंची से ऊंची शिक्षा पा गए, हमसे भी बड़े-ऊंचे लोग बन गए, लेकिन हम उन्हें वह सभ्यता नहीं दे पाए, जिसमें आस भी होता था और पड़ोस भी होता था। घर के भाइयों की तरह पड़ोस में भी भाई और वे दादा-दादी हुआ करते थे, जो हमारी गलती होने पर भी अपने पोते-पोतियों को पहले फटकारते थे। लेकिन यह सब क्यों हुआ? शहरों की तरह सुविधाएं, रोजगार और उच्च शिक्षा गांवों-कस्बों में भी होती तो कोई क्यों अपनी जड़ों से कटता? कई देशों में आज गांव वाले, शहर वालों से अच्छी सुविधाएं पा रहे हैं और खुद को सुपीरियर भी मानते हैं। लेकिन हिंदुस्तान में नेताओं, सरकारों ने हमें ऐसा मौका नहीं दिया है। कोई कुछ सोचता-करता नहीं। न विधायक, न सांसद, न मंत्री, न सरकार। सवाल उठता है कि ये सब इतने जिम्मेदार पदों पर हैं ही क्यों? फिर सवाल उठता है कि इन्हें जिताता कौन है? हम ही। कहीं न कहीं, हम ही जिम्मेदार हैं। लेकिन संकल्प लेना होगा कि अब ऐसा नहीं करेंगे, जैसा करते आए हैं। दरअसल, सरकार की नजर में तो नरेगा ही गांवों के विकास की कुंजी है। लेकिन यह गलत है। अब न तो गांव नरेगा के लिए मरेगा और न ही मजदूरी के सहारे पूरा जीवन काटेगा। उसे वे तमाम सुविधाएं चाहिए, जो शहरों और शहर वालों के लिए हैं। और ये संभव भी है। जरूरत है इच्छाशक्ति की। एक शिद्दत की। एक संकल्प की। जरूरत है भगीरथ बनने की। सच्चे विकास की कल-कल गंगा को यहां आने से फिर कौन रोक सकता है? अगर ऐसा हो जाता है तो फिर हमें किसी होर्मुज का डर नहीं होगा। कोई नहीं कहेगा कि सोना मत खरीदो। तेल कम खर्च करो। निश्चित रूप से संकट जब आएगा तो हर तरफ उसका असर होगा, लेकिन गांव हमारे साथ होगा, जीवनशैली साधारण होगी तो चिंता कम होगी।