पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:दौड़भाग की दुनिया में कुछ अभ्यास रुकने का जरूर करें
भागमभाग की इस दुनिया में अब और भागने का समय आ गया। यह भी तय है कि यदि आप भागेंगे नहीं तो हाशिए पर पटक दिए जाएंगे। तो कुछ अभ्यास रुकने का जरूर करिए। उसमें योग और योग का भी सातवां चरण ‘ध्यान’ बड़ा काम आएगा। हमारे भीतर तनाव और अवसाद के जो जीन्स होते हैं, उनके प्रभाव को यदि रिवर्स करना हो, तो ध्यान बहुत उपयोगी है। इससे हमारी कोशिकाओं पर मोलिक्यूलर सिग्नेचर छूटता है, जो हमें तनाव मुक्त करता है। हम भूल जाते हैं कि भागते-भागते एक दिन हम कहीं नहीं पहुंचेंगे। तुलसीदास ने गरुड़ और काकभुशुंडि के प्रसंग में एक जगह लिखा है- नौकारूढ़ चलत जग देखा, अचल मोह बस आपुहि लेखा। नाव पर चढ़ा हुआ मनुष्य जगत को चलता हुआ देखता है और मोहवश अपने को अचल समझता है। इस गलतफहमी को दूर किया जा सकता है। हम थोड़ी देर के लिए अचल हो जाएं। दिनभर में दो-तीन बार शॉर्ट मेडिटेशन कर लें तो दौड़ती दुनिया में थोड़ी देर रुके हुए हम शांति को भी उपलब्ध हो जाएंगे।