पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हमारे कार्यों से दुर्गुण गिर जाएं
हम लोग अधिकांश मौकों पर प्रतिक्रिया में ही जीते हैं। किसी ने कुछ हमसे कहा, हमारे लिए अच्छा किया या बुरा किया और हम तुरंत रिएक्ट करते हैं। धीरे-धीरे हमारा मौलिक कृत्य समाप्त हो जाता है। हम प्रतिक्रिया के पुतले बनकर रह जाते हैं। हमारे सुख और दु:ख का रिमोट दूसरों के हाथ में चला जाता है। जबकि होना तो ये चाहिए कि हमारा कृत्य धीरे-धीरे सृजन में बदल जाए। और जब कोई भी काम रचनात्मक होता है तो हम अपने आप ईश्वर की ओर चल पड़ते हैं। हमारे कृत्य में से जब दुर्गुण गिर जाते हैं तो फिर वह काम पूजा हो जाता है। पूजा का परिणाम ईश्वर का सान्निध्य है। काकभुशुंडि जी ने गरुड़ जी से कहा- काम क्रोध मद लोभ रत, गृहासक्त दुखरूप, ते किमि जानहिं रघुपतिहि, मूढ़ परे तम कूप। जो काम, क्रोध, मद और लोभ में रत हैं और दु:ख-रूप घर में आसक्त हैं, वे रघुनाथ जी को कैसे जान सकते हैं? वे मूर्ख तो अंधकार रूपी कुएं में पड़े हैं। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हमारे कार्यों में से दुर्गुण गिर जाएं। जो उपलब्ध होगा, वो श्रेष्ठ होगा।