पवन के. वर्मा का कॉलम:प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र में भी कुछ क्षण पूरे राष्ट्र के लिए होते हैं
18 अप्रैल को प्रधानमंत्री ने ‘राष्ट्र के नाम सम्बोधन’ दिया था। उन्हें ऐसा करने का पूरा अधिकार है, क्योंकि वे सरकार के प्रमुख हैं। लेकिन वे पूरे देश के प्रधानमंत्री भी हैं। उनका पद दलगत नहीं; संवैधानिक है। इसलिए राष्ट्र के नाम सम्बोधन से एक अलिखित किंतु अपेक्षित सिद्धांत का पालन करने की उम्मीद की जाती है। वो सिद्धांत यह है कि ऐसे सम्बोधन को दलगत राजनीति के प्रसंगों से परे होना चाहिए। उसे नागरिकों को नागरिकों के ही रूप में सम्बोधित करना चाहिए, मतदाताओं के रूप में नहीं। साथ ही उसे समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करना चाहिए और परिप्रेक्ष्यों को स्पष्ट करना चाहिए। परम्परागत रूप से, ऐसे सम्बोधन राष्ट्रीय महत्व के क्षणों में ही दिए जाते रहे हैं : युद्ध, आर्थिक संकट, महामारियां, प्राकृतिक आपदाएं या महत्वपूर्ण नीतिगत घोषणाएं। जब पं. जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्रता की पूर्व-संध्या पर राष्ट्र को सम्बोधित किया था, तो उनके उस उद्बोधन में एक सभ्यतागत-संक्रमण की मार्मिक अभिव्यक्ति थी। जब इंदिरा गांधी ने 1971 के युद्ध के दौरान राष्ट्र को सम्बोधित किया था, तो वह संघर्ष के उस काल में देश को स्थिर करने के लिए था। हाल के सालों में, वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान मनमोहन सिंह या कोविड-19 महामारी की शुरुआत में नरेंद्र मोदी के भाषण भी लोगों को सूचित, आश्वस्त और एकजुट करने के उद्देश्य से ही प्रसारित किए गए थे। किंतु जब राष्ट्र के नाम सम्बोधन का उपयोग विपक्ष की आलोचना करने के लिए किया जाता है तो यह सामान्य शिष्टाचार के साथ ही संवैधानिक नैतिकता के औचित्यों पर भी प्रश्न खड़े करता है। यूं तो वैधानिक रूप से, राष्ट्र के नाम सम्बोधन की अंतर्वस्तु निर्धारित करने वाला कोई विशिष्ट कानून नहीं है। संविधान भी इस विषय पर मौन ही है। लेकिन लोकतंत्र कानूनों के साथ ही परम्पराओं से भी संचालित होता है और ये वो अनिवार्य मर्यादाएं हैं, जो संस्थागत अखंडता को अक्षुण्ण रखती हैं। भारत के प्रधानमंत्री नि:संदेह एक राजनेता भी होते हैं। वे किसी दल का नेतृत्व करते हैं, चुनाव लड़ते हैं और प्रतिद्वंद्वी राजनीति में यथाशक्ति संलग्न रहते हैं। लेकिन जब वे राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं, तब उनकी यह भूमिका बदल जाती है। ऐसा नहीं होने पर राज्यसत्ता और राजनीतिक दल, सरकार और सत्तारूढ़-व्यवस्था के बीच की रेखा धुंधलाने का जोखिम पैदा होता है। यह कोई मामूली अंतर नहीं है; यह लोकतांत्रिक निष्पक्षता के सारतत्व तक जाता है। ऐसे सम्बोधनों के लिए उपयोग किए जाने वाले प्रसारण माध्यम भी- फिर चाहे वह दूरदर्शन हो या ऑल इंडिया रेडियो- सार्वजनिक संसाधन होते हैं। वे करदाताओं के धन से संचालित होते हैं और पूरे राष्ट्र की निष्पक्ष सेवा के लिए होते हैं। साथ ही, यह सम्बोधन उस समय दिया गया था, जब पश्चिम बंगाल या तमिलनाडु जैसे राज्यों में चुनावों की पूर्व संध्या पर आदर्श आचार संहिता लागू थी। इसकी निगरानी निर्वाचन आयोग करता है। यह संहिता चुनावों के दौरान समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है। यह आधिकारिक तंत्र, सार्वजनिक धन और सरकारी मंचों के अवांछनीय उपयोग पर रोक लगाती है। ऐसे उल्लंघनों पर अंकुश लगाने में निर्वाचन आयोग पर्याप्त सक्षम है। वह परामर्श जारी कर सकता है, स्पष्टीकरण मांग सकता है और आवश्यकता पड़ने पर उन गतिविधियों की निंदा भी कर सकता है, जो समान अवसर के सिद्धांत को कमजोर करने वाली होती हैं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह भविष्य के लिए दिशा-निर्देश तय कर सकता है, ताकि ऐसी प्रवृत्तियों को हतोत्साहित किया जा सके। ऐसे मानदंडों में आधिकारिक सम्बोधनों और राजनीतिक भाषणों के बीच स्पष्ट अंतर करना; राष्ट्रीय प्रसारणों में पक्षधर सामग्री पर प्रतिबंध और चुनावी अवधि के दौरान यह सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा उपाय शामिल हो सकते हैं कि सार्वजनिक प्रसारण मंचों का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए न हो। ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक निष्पक्षता की रक्षा के प्रयास हैं। वास्तव में, निर्वाचन आयोग और अन्य राजनीतिक दलों से परामर्श करके प्रधानमंत्री कार्यालय स्वयं राष्ट्रीय सम्बोधनों के लिए आचार-संहिता निर्धारित करने की पहल कर सकता है। इससे इस कार्यालय की गरिमा ही ऊंची होगी। जब प्रधानमंत्री राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं, तो वे एक ऐसे मंच पर होते हैं, जो राजनीति से ऊपर है। तब उनके शब्दों में समावेश, संयम और उत्तरदायित्व का प्रतिबिम्ब झलकना अपेक्षित है। एक प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र में भी कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जो पूरे राष्ट्र के लिए होते हैं। राष्ट्र के नाम सम्बोधन भी ऐसा ही एक क्षण है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)