प्रियदर्शन का कॉलम:अपनी पहचान को भूगोल तक ही सीमित रखना उचित नहीं
पंजाबी संगीत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिन लोगों ने प्रतिष्ठा दिलाई है, उनमें दिलजीत सिंह दोसांझ भी हैं। गायन के अलावा अभिनय में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है। वे कई सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखते रहे हैं। 2020 में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चले किसान आंदोलन का उन्होंने समर्थन किया था। बीते दिनों कनाडा में अपने एक कार्यक्रम में उन्होंने खालिस्तानी झंडा लहराने वालों को फटकार लगाई थी और कहा कि वे प्रेक्षागृह से बाहर चले जाएं। इसको लेकर उनको धमकियां भी मिलीं। शायद इसी शोहरत और सरोकार की वजह से ‘जागो पंजाब’ नामक एक संगठन ने उनसे राजनीति में उतरने और चुनाव लड़ने की अपील की। दोसांझ ने इससे इनकार किया और कहा कि उनका काम बस मनोरंजन करना है। वैसे क्या दिलजीत दोसांझ चाहते तो भी चुनाव लड़ सकते थे? बताया जा रहा है कि 2022 में उन्होंने अमेरिकी नागरिकता ले ली है और अब कहीं भी वे अमेरिकी नागरिक के तौर पर ही आ-जा रहे हैं। यानी वे अब भारतीय नागरिक नहीं हैं और चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। लेकिन क्या भारत की नागरिकता छोड़ने की वजह से दिलजीत सिंह दोसांझ कुछ कम भारतीय रह गए हैं? वे अब भी अपनी पहचान में भारतीय हैं- शायद कई भारतीयों से ज्यादा। दोसांझ का यह मामला अक्षय कुमार की याद दिलाता है, जो बरसों तक कनाडा के नागरिक रहे। किसी आम चुनाव में जब टीवी चैनलों ने यह सवाल उठाया कि उन्होंने वोट क्यों नहीं दिया, तब यह बात खुली कि वे भारत में वोट नहीं डाल सकते। बाद में उन्होंने फिर से भारतीय नागरिकता अर्जित की। ऐसे उदाहरण और भी होंगे। इन्हीं से यह सवाल पैदा होता है कि दुनिया के कई देशों की तरह क्या भारत में भी अब दोहरी नागरिकता पर विचार नहीं किया जाना चाहिए? यानी कोई भारतीय कनाडा या अमेरिका का नागरिक होने के बावजूद भारत का नागरिक बना रह सके- इसकी कानूनी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए? दुनिया में अभी साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा भारतीय लोग अलग-अलग देशों में बसे हुए हैं। हर साल करीब 25 लाख लोग देश छोड़ रहे हैं। ये वे लोग हैं, जो शिक्षा, रोजगार या अवसरों की उपलब्धता देखते हुए विदेश जा रहे हैं। इनमें से बहुत सारे लोग भारत से प्रेम करते हैं और यहां की घटनाओं पर करीबी नजर रखते हैं। नरेंद्र मोदी या राहुल गांधी के विदेशी दौरों पर आप्रवासी भारतीयों का जो जुटान होता है, उनमें जो उत्साह दिखता है, वह बताता है कि एक भारत अब भी उनके भीतर बसा हुआ है। इंग्लैंड या शारजाह या ऑस्ट्रेलिया में होने वाले क्रिकेट के मुकाबले में जो लोग अपने गाल पर तिरंगा बनाए, हाथ में तिरंगा लहराते इंडिया-इंडिया चिल्लाते हैं, वे दरअसल वही भारतीय हैं जो यहां से जा चुके हैं, लेकिन अपने साथ एक भारत भी ले गए हैं। अगर भारत में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था हो तो बहुत सारे लोग अपनी भारतीयता और अपनी नागरिकता बचाए रखना चाहेंगे। वैसे भी दुनिया जिस भूमंडलीकरण से इन दिनों बन-बिगड़ रही है, उसमें अपनी सरहदों को सिकोड़े रखना, अपनी पहचान को अपने भूगोल तक सीमित रखना उचित नहीं है। ‘अमेरिका फर्स्ट’ या मागा जैसे राजनीतिक मुहावरों के साथ जिस तरह ट्रम्प ने अमेरिकी लोकतंत्र का सम्मान घटाया है और अमेरिकी राष्ट्र की सर्वसमावेशिता को चोट पहुंचाई है, उसी तरह कुछ अतिरिक्त उत्साही लोग भारत में भी यही काम कर रहे हैं। अच्छा हो कि भारत अपने भूगोल से बाहर भी अपनी नागरिकता का विस्तार करे और जो भारतीय दूसरे देशों की नागरिकता लेने की वजह से अपनी भारतीय पहचान से वंचित रह जा रहे हैं, उन्हें भी भारतीय बने रहने का अवसर दे। जाने-अनजाने भारत की नागरिकता को सिकोड़ने के उपक्रम ना करें। इससे देश कुछ मजबूत ही होगा, कमजोर नहीं। अच्छा हो कि भारत अपने भूगोल से बाहर भी अपनी नागरिकता का विस्तार करे और जो भारतीय दूसरे देशों की नागरिकता लेने की वजह से भारतीय पहचान से वंचित रह जा रहे हैं, उन्हें भी भारतीय बने रहने का अवसर दे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)