प्रो. चेतन सिंह सोलंकी का कॉलम:जलवायु सुधार के लिए सबसे जरूरी है "इनएक्टिविटी', यानी कुछ न करें

Apr 29, 2026 - 06:08
प्रो. चेतन सिंह सोलंकी का कॉलम:जलवायु सुधार के लिए सबसे जरूरी है "इनएक्टिविटी', यानी कुछ न करें
जैसे ही तापमान बढ़ता है, हर जगह यह चर्चा होने लगती है कि पेड़ लगाइए, हरियाली बढ़ाइए, तभी गर्मी कम होगी। यह सोच आंशिक रूप से सही है, लेकिन पूरी सच्चाई नहीं है। आज जो असहनीय गर्मी हम महसूस कर रहे हैं, उसका मुख्य कारण पेड़ों की कटाई नहीं, वे ग्रीनहाउस गैसें हैं, जिन्हें हम लगातार अपने वातावरण में छोड़ रहे हैं। ये गैसें एक कम्बल की तरह पृथ्वी को ढक लेती हैं और सूर्य की गर्मी को बाहर जाने नहीं देतीं। आज वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा सामान्य स्तर से लगभग 53% अधिक है। इसका मतलब है धरती की हीट को ट्रैप करने की क्षमता 53% बढ़ गई है। इस एक्स्ट्रा हीट के कारण धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है। वर्तमान में इस अतिरिक्त गर्मी का सबसे बड़ा कारण है हमारी ऊर्जा खपत, जिसमें पेट्रोल, डीजल, गैस, बिजली और रोजमर्रा के उत्पादों का उपयोग शामिल है। वर्तमान समय में कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग 75% हिस्सा इसी से आता है। भूमि उपयोग में बदलाव, खेती और वनों की कटाई के कारण भी कार्बन उत्सर्जन होता है, परंतु यह सब मिलाकर लगभग 25% होता है। इस 25% में भी पेड़ों की कटाई के कारण होने वाला कार्बन उत्सर्जन लगभग 10% ही है। इसका सीधा मतलब है कि समस्या का बड़ा हिस्सा हमारी जीवनशैली और उपभोग से जुड़ा है। यही वह जगह है, जहां हम व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक रूप से गलती कर देते हैं। हम समस्या के छोटे हिस्से पर जोर देते हैं और समाधान भी उसी के आसपास ढूंढते हैं। पेड़ लगाना निश्चित रूप से आवश्यक है, लेकिन यह जलवायु परिवर्तन का मूल समाधान नहीं है। यदि हमारी खपत इसी तरह बढ़ती रही, तो करोड़ों-अरबों पेड़ भी इस समस्या को संतुलित नहीं कर पाएंगे। हमें एक असहज कर देने वाली, लेकिन जरूरी सच्चाई को स्वीकार करना होगा- आज मानवता पृथ्वी की क्षमता से कहीं अधिक संसाधनों का उपयोग कर रही है। हम ऐसे जी रहे हैं, जैसे हमारे पास एक से अधिक पृथ्वियां हों, जबकि वास्तव में केवल एक ही है। इस स्थिति में सबसे पहला और सबसे प्रभावी कदम क्या हो सकता है? हमें अपनी ऊर्जा और वस्तुओं की खपत को लगभग आधा करना होगा। जब तक हम अपनी जरूरतों और इच्छाओं के बीच संतुलन नहीं बनाते, तब तक कोई भी तकनीक, कोई भी नीति या कोई भी अभियान स्थायी समाधान नहीं दे सकता। दुर्भाग्य से सरकारों का हर प्रयास और कम्पनियों का हर विज्ञापन आपको ज्यादा से ज्यादा उपभोग के लिए प्रोत्साहित करता है, और आप उसके दुष्चक्र में फंस जाते हैं। हम अकसर कहते हैं- रोकथाम इलाज से बेहतर है। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में यह बात और भी सटीक बैठती है। पेड़ लगाना, सोलर पेनल लगाना या इलेक्ट्रिक वाहन अपनाना- ये सभी इलाज के सराहनीय प्रयास हैं। लेकिन रोकथाम है अनावश्यक खपत को कम करना। और सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह रोकथाम किसी बड़ी तकनीक, भारी निवेश या सरकारी नीति पर निर्भर नहीं है। यह पूरी तरह हमारे अपने निर्णयों पर निर्भर है। हम क्या खरीदते हैं, कितना इस्तेमाल करते हैं, और क्या त्याग कर सकते हैं- यही मायने रखता है। जलवायु सुधार के लिए सबसे बड़ा कदम इन-एक्टिविटी है, यानी कुछ न करना। इसका मतलब है अनावश्यक चीजें न खरीदना, न इस्तेमाल करना। इसका प्रभाव बहुत बड़ा है। यदि हम आज भी नहीं रुके, तो इतिहास हमें भी उसी तरह याद करेगा, जैसे हम डायनासोर को याद करते हैं। वर्षों साल बाद धरती पर एक नई प्रजाति आएगी और कहेगी, एक समय पृथ्वी पर इंसान हुआ करते थे! (ये लेखक के अपने विचार हैं)