बोरिया मजुमदार का कॉलम:खेलों की ‘सॉफ्ट पावर’ को हमें गम्भीरता से लेना होगा

May 9, 2026 - 06:05
बोरिया मजुमदार का कॉलम:खेलों की ‘सॉफ्ट पावर’ को हमें गम्भीरता से लेना होगा
बंगाल के चुनाव परिणामों पर काफी बात हो चुकी है, इसलिए मैं एक दूसरे विषय पर बात करना चाहूंगा। और वो यह है कि ताजा नतीजों का इस राज्य में खेलों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? क्या चीजें बेहतर हो सकती हैं, और आगे का रास्ता क्या हो सकता है? तथ्य यह है कि पिछले कुछ वर्षों में बंगाल में खेलों के क्षेत्र में कोई वास्तविक प्रगति नहीं हुई है। राज्य में कोई बड़े टूर्नामेंट आयोजित नहीं हुए हैं। कुछ हॉकी टर्फों को छोड़ दें तो कोई अन्य बुनियादी ढांचा विकसित नहीं हुआ है और न ही राज्य से कोई उल्लेखनीय प्रतिभा उभर कर सामने आई है। यह वहां की राजनीतिक व्यवस्था की आलोचना नहीं है, लेकिन सच्चाई यह है कि पड़ोसी राज्यों की तुलना में अंतर साफ दिखाई देता है। बिहार में खेल बजट अब चालू वर्ष के लिए 550 करोड़ रुपए से अधिक हो चुका है। ओडिशा इसे पहले ही कई वर्षों से 1000 करोड़ रुपए के पार पहुंचा चुका है। पिछले एक दशक में उसने अनेक अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों की मेजबानी की है। बिहार ने भी अब ऐसा करना शुरू कर दिया है। तेलंगाना ने भी कई रणनीतिक खेल साझेदारियां की हैं और हाल ही में उसने महिला हॉकी विश्व कप क्वालिफायर की मेजबानी भी की थी। बंगाल में भी अपार सम्भावनाएं हैं और गंभीर प्रयास किए जाएं, तो हालात बदलते दिखाई दे सकते हैं। मैं राजनीतिक ताने-बाने पर टिप्पणी करने के लिए स्वयं को योग्य नहीं मानता, लेकिन इतना मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि खेल एक बहुत बड़ा अवसर हैं। तीरंदाजी, टेबल टेनिस, फुटबॉल, निशानेबाजी, मुक्केबाजी- इन सभी खेलों का बंगाल में बड़ा भविष्य है, बशर्ते प्रतिभाओं को सही ढंग से पहचाना और संवारा जाए। और इतना मानना पर्याप्त होगा कि भाजपा इसे साबित करने के लिए हरसम्भव प्रयास करेगी। यही वह चीज है, जो खेलों के लिए अवसर पैदा करती है। भारत पहले ही 2030 राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी कर रहा है। हम 2036 ओलंपिक और 2038 एशियाई खेलों की मेजबानी के लिए भी बोली लगा रहे हैं। स्पष्ट है कि खेल को अब एक ‘सॉफ्ट पावर’ माध्यम के रूप में देखा जा रहा है, और आशावाद की जड़ भी यही है। इस क्षेत्र में कुछ ठोस करना देश का ध्यान आकर्षित करेगा और राजनीतिक वर्ग को भी लाभ पहुंचाएगा, क्योंकि यह अपेक्षाकृत आसान उपलब्धि है। बड़े उद्योगों की स्थापना या रोजगार-सृजन की तरह यहां प्रभाव दिखाने में बहुत लंबा समय नहीं लगता। खेलों में आप अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की मेजबानी शुरू कीजिए, कोई ‘खेलो इंडिया’ आयोजन कराइए, राष्ट्रीय खेलों का आयोजन कीजिए- और अचानक पूरे राज्य के इर्द-गिर्द एक नई हलचल पैदा हो जाती है। पश्चिम बंगाल में भी निश्चित रूप से यह क्षमता मौजूद है और पूरी सम्भावना है कि अगले एक-दो वर्षों में इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण होता हुआ हमें दिखाई दे। शतरंज को ही लें। वर्षों से बंगाल की इस खेल में समृद्ध परम्परा रही है। हमने टाटा स्टील शतरंज टूर्नामेंट जैसे आयोजनों को देखा है। इस खेल का एक इतिहास है। फिर अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं क्यों नहीं आयोजित की जा सकतीं? यही बात मुक्केबाजी, तीरंदाजी और टेबल टेनिस पर भी लागू होती है। नेताजी इनडोर स्टेडियम या खुदीराम अनुशीलन केंद्र में आखिरी बार कोई बड़ा खेल आयोजन कब हुआ था? बंगाल में बड़े होते समय मैंने इन परिसरों में अनेक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं आयोजित होते देखी थीं। लेकिन अब इन स्टेडियमों का उपयोग ज्यादातर राजनीतिक सभाओं और एक्सपो के लिए होता है। रग्बी भी ऐसा खेल है जिसमें बहुत कुछ किया जा सकता है। भारत ने चीन में हुए 2023 के एशियाई खेलों से पहले कोलकाता में महिला प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया था। हाल के वर्षों में बंगाल ने किसी बड़े खेल आयोजन की मेजबानी नहीं की है और जब करने की कोशिश की भी- जैसे लियोनल मेसी की भारत-यात्रा के दौरान- तो वह अंततः एक तमाशे में बदल गया। भाजपा इस मुद्दे पर बेहद मुखर रही है, इसलिए अब यह उसी की जिम्मेदारी है कि वह राज्य की संभावनाओं को सामने लाए और इस क्षेत्र में ठोस काम करके दिखाए। इसका पहला संकेत तब मिलेगा, जब नए खेल मंत्री की नियुक्ति होगी और नई सरकार का पहला बजट सामने आएगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)