विराग गुप्ता का कॉलम:भारतीय के बजाय विदेशी कंपनियों को टैक्स छूट क्यों?

Jun 24, 2026 - 06:14
विराग गुप्ता का कॉलम:भारतीय के बजाय विदेशी कंपनियों को टैक्स छूट क्यों?
एआई के लिए सेमीकंडक्टर बनाने वाली एनवीडिया कंपनी की वैल्यू भारत की जीडीपी से ज्यादा है। इलॉन मस्क अपनी स्पेस एक्स कंपनी के शेयरों के दम पर 174 देशों से भी अधिक सम्पत्ति वाले दुनिया के सबसे रईस व्यक्ति बन गए हैं। डेटा, तेल और एआई- इन तीन बड़ी बातों से डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका की बादशाहत को कायम रखने की कोशिश कर रहे हैं। अगले 5 सालों में 500 अरब डॉलर यानी 47 लाख करोड़ रुपए की अमेरिकी वस्तुओं और सेवाओं के आयात के लिए भारत पर दबाव बढ़ रहा है। उसी कड़ी में भारत में डेटा सेंटर्स की स्थापना हो रही है, क्योंकि अमेरिकी डेटा सेंटरों के लिए मशीनों और सेवाओं का भारत में आयात होगा। इस परिदृश्य के पांच पहलुओं को समझना जरूरी है : 1. अमेरिकी एआई कंपनियों को सफल होने के लिए बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर की जरूरत है। हमारे आम बजट में सिर्फ 1 साल के लिए टैक्स के नियम बनाए जाते हैं। लेकिन अमेरिका के दबाव में इस साल के बजट में विदेशी क्लाउड कम्पनियों को साल 2047 तक इनकम टैक्स में छूट दे दी गई है। इस टैक्स छूट की वजह से अगले चार सालों में 5000 मेगावॉट यानी पांच गीगावॉट के विदेशी डेटा सेंटर्स स्थापित करने का लक्ष्य है। स्वदेशी कंपनियों को टैक्स छूट नहीं मिलना संविधान की समानता के उल्लंघन के साथ सार्वभौमिकता का भी हनन है। 2. दुनिया के कुल डेटा का लगभग 25% भारत से जनरेट हो रहा है। भारत में डेटा सुरक्षा कानून लागू नहीं होने से अमेरिका की टेक कंपनियां और मालिक मालामाल हो रहे हैं। पिछले साल यूपीआई से 314 लाख करोड़ के लेनदेन हुए, जो ग्लोबल रियल टाइम पेमेंट का 49% है। रिजर्व बैंक ने 2018 में डेटा को भारत में सुरक्षित रखने के लिए नियम बनाए थे, जिन्हें विदेशी कंपनियों पर लागू नहीं किया जा रहा है। 3. केंद्र सरकार ने पिछले साल कहा था कि विदेशी कंपनियों को भारत में परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट स्थापित करने के बाद ही टैक्स में छूट मिलेगी। अब उन्हें भारत में ऑफिस स्थापित करने की बाध्यता नहीं है, इससे भारत के श्रम कानून उन पर लागू नहीं होंगे। विदेशी डेटा सेंटर कंपनियों को राज्यों की सरकारें जमीनों का आवंटन और रियायतें दे रही हैं। खरबों डॉलर के निवेश वाले इन डेटा सेंटर्स से औद्योगिक क्रांति नहीं होने से दीर्घकालिक रोजगारों का सृजन भी नहीं होगा। 4. डेटा सेंटर्स को चौबीसों घंटे बिजली चाहिए या डीजल वाले जनरेटर सेट के बैकअप की जरूरत होगी। चार सालों में डेटा सेंटर्स में बिजली की खपत 6 गुना बढ़ जाएगी। इनकी सहूलियत के लिए भारत में परमाणु बिजली का कानून नया बनाया गया है। इनसे चेर्नोबिल जैसे हादसे होने का खतरा बढ़ गया है। राज्यों की बिजली कंपनियां सात लाख करोड़ के कर्ज से दबी हैं। डेटा सेंटर्स की वजह में ऊर्जा के साथ विदेशी मुद्रा का संकट गहरा सकता है। 5. गर्मी के उत्सर्जन और रैडिएशन की वजह से अमेरिका में डेटा सेंटर बंद करने का आंदोलन चल रहा है। दुनिया के सबसे गर्म 100 शहरों वाले भारत में नदियां और तालाब पहले ही सूख रहे हैं। गर्मी से भारत की जीडीपी को 4.5 फीसदी का झटका लग सकता है। भारत में 60 करोड़ से ज्यादा लोग जल संकट से ग्रस्त हैं। खरबों गैलन पानी निगलने वाले डेटा सेंटर्स की वजह से भूगर्भजल के साथ पेयजल का संकट गहरा सकता है। अंतरिक्ष और समुद्र में डेटा सेंटर के ख्वाब बेचकर मस्क टेक-कुबेर बन गए हैं। गरीबी, एकाधिकार, बेरोजगारी, जलवायु जोखिम और साम्राज्यवाद बढ़ाने वाले विदेशी डेटा सेंटर्स की टैक्स छूट खत्म हो। संविधान के अनुसार डेटा सेंटर्स में पर्यावरण संरक्षण और श्रम कानूनों को लागू करने की जरूरत है। हमारे आम बजट में सिर्फ 1 साल के लिए टैक्स के नियम बनाए जाते हैं। लेकिन अमेरिका के दबाव से इस साल के बजट में विदेशी क्लाउड कम्पनियों को साल 2047 तक इनकम टैक्स में छूट दे दी गई है। इसका क्या कारण है? (ये लेखक के अपने विचार हैं)