आरती जेरथ का कॉलम:परीक्षा-प्रणाली पर भरोसे का डगमगाना एक बड़ी त्रासदी है

May 19, 2026 - 06:05
आरती जेरथ का कॉलम:परीक्षा-प्रणाली पर भरोसे का डगमगाना एक बड़ी त्रासदी है
3 मई को आयोजित नीट-यूजी 2026 परीक्षा (देशभर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए केंद्रीय परीक्षा) का पेपर लीक होने के बाद उसे रद्द किया जाना लाखों छात्रों और उनके परिवारों के लिए किसी गहरे आघात से कम नहीं है। इन छात्रों और उनके परिवारों ने महीनों, बल्कि वर्षों तक अपनी जिंदगी को इस उम्मीद में थाम रखा था कि यह एक परीक्षा उनके लिए बेहतर भविष्य का दरवाजा खोलेगी। हालांकि नई परीक्षा 21 जून को होना तय की गई है, लेकिन इस कैंसलेशन का असर लगातार गहराता जा रहा है। अब तक कम से कम तीन अभ्यर्थी आत्महत्या कर चुके हैं, जबकि हजारों अन्य मानसिक अवसाद से जूझ रहे हैं। उनके सामने फिर से चिंता, अनिश्चितता और कठोर पढ़ाई का एक और दुष्चक्र खड़ा हो गया है। सरकार ने मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं और अब तक नौ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। यह लीक अब अनेक शहरों में फैले घोटाले का रूप लेता दिख रहा है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने यह कहते हुए परीक्षा रद्द करने को उचित ठहराया कि सरकार नहीं चाहती योग्य छात्रों को तकलीफें उठानी पड़ें। उन्होंने यह भी कहा कि अगले वर्ष से नीट-यूजी पेन-एंड-पेपर प्रणाली के बजाय कंप्यूटर पर ऑनलाइन आयोजित की जाएगी, और जो छात्र री-एग्जाम में शामिल नहीं होना चाहते, उन्हें परीक्षा-फीस लौटाई जाएगी। लेकिन 3 मई को परीक्षा देने वाले अनुमानित 22.05 लाख छात्रों के लिए परीक्षा-शुल्क इतना मायने नहीं रखता। देश की प्रतिस्पर्धी परीक्षा-व्यवस्था छात्रों और उनके परिवारों से कमरतोड़ कीमत वसूलती है। अभी-अभी किशोरावस्था से बाहर आए लड़के-लड़कियों को कोटा, सीकर, प्रयागराज जैसे शहरों की ‘कोचिंग फैक्ट्रियों’ में भेज दिया जाता है। वे दोस्तों से दूर हो जाते हैं, उनकी दिनचर्या बिगड़ जाती है और वे शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य-समस्याओं से जूझते हैं। वे सफल होने की उम्मीद में घंटों पढ़ाई में जुटे रहते हैं। यह महीनों, कभी-कभी वर्षों तक चलता रहता है और अभ्यर्थी अपने सपनों की परीक्षा पास करने के लिए खुद को टूटने की कगार तक धकेल देते हैं। विशेषकर टियर-2 और टियर-3 शहरों में रहने वाले मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों को मेडिकल कॉलेज या किसी आईआईटी में भेजने का सपना पालते हैं और उसके लिए किसी भी त्याग को तैयार रहते हैं। वे इन कोचिंग संस्थानों की फीस और बच्चों के रहने-खाने के खर्च के लिए अपनी जीवनभर की बचत दांव पर लगा देते हैं। अकसर वे अपने दूसरे बच्चों की शादियां टाल देते हैं, घर की मरम्मत का काम रोक देते हैं, यहां तक कि अपना इलाज भी टाल देते हैं, इस उम्मीद में कि उनके बच्चे एक दिन योग्य डॉक्टर, इंजीनियर बनेंगे या कोई प्रतिष्ठित नौकरी हासिल करेंगे। एनटीए की स्थापना 2018 में इस उद्देश्य से की गई थी कि सरकारी संस्थानों में इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे प्रमुख पेशेवर पाठ्यक्रमों की परीक्षाओं का संचालन केंद्रीकृत किया जा सके। एनटीए जिन परीक्षाओं का आयोजन करती है, उनमें आईआईटी के लिए जेईई (मेन), नीट-यूजी, सीयूईटी-यूजी, यूजीसी-नेट और सीएसआईआर-नेट जैसी परीक्षाएं शामिल हैं। लेकिन पेपर लीक और परीक्षाओं के रद्द होने से जुड़े विवादों ने उसके रिकॉर्ड को लगातार दागदार किया है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा 2024 में संसद को दिए आंकड़ों के अनुसार यद्यपि एनटीए ने 240 परीक्षाएं सफलतापूर्वक आयोजित कीं, लेकिन उसी अवधि तक उसे प्रतिष्ठित पदों और प्रवेशों से जुड़ी कम से कम 16 महत्वपूर्ण परीक्षाएं स्थगित भी करनी पड़ी थीं। 2025 में शिक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने पाया कि 2024-25 की अवधि में एनटीए द्वारा आयोजित 14 प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में से कम-से-कम पांच को पेपर लीक और परिणामों के संकलन में त्रुटियों जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा। उदाहरण के लिए, जेईई (मेन) 2025 में अंतिम उत्तर-कुंजी में पाई गई गलतियों के कारण 12 प्रश्नों को वापस लेना पड़ा था। सबसे गंभीर बात यह है कि यह पहली बार नहीं है जब नीट-यूजी किसी घोटाले में घिरी हो। 2024 में भी पेपर लीक हुआ था। उस वर्ष मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था, जिसने यह तो माना था कि पेपर लीक हुआ था, लेकिन यह कहते हुए परीक्षा रद्द करने से इनकार कर दिया कि री-एग्जाम छात्रों पर अत्यधिक बोझ डालेगा। शिक्षा मंत्रालय को इस प्रश्न का उत्तर देना चाहिए कि आखिर पेपर लीक और अन्य समस्याएं लगातार एनटीए का पीछा क्यों कर रही हैं? एनटीए द्वारा आयोजित नहीं की जाने वाली परीक्षाएं- जैसे सीबीएसई और यूपीएससी की परीक्षाएं तो अमूमन इन समस्याओं से अछूती रहती हैं। उस परीक्षा-व्यवस्था की विश्वसनीयता को बड़ा आघात लगा है, जिसे युवाओं को समान अवसर देने वाली पारदर्शी प्रणाली होना चाहिए। लोग कब तक ऐसी एजेंसी पर भरोसा करते रहेंगे, जिसने बार-बार उन्हें निराश किया है? (ये लेखिका के अपने विचार हैं)