एन. रघुरामन का कॉलम:कार्य में जब मात्रा बढ़ती है तो प्रतिक्रिया की रफ्तार तेजी से घट जाती है।

Jun 19, 2026 - 06:08
एन. रघुरामन का कॉलम:कार्य में जब मात्रा बढ़ती है तो प्रतिक्रिया की रफ्तार तेजी से घट जाती है।
आधुनिक इमरजेंसी हेल्पलाइन अब आधिकारिक तौर पर सॉफिस्टिकेटेड टॉर्चर डिवाइस बन चुकी हैं। कल्पना कीजिए, एक व्यक्ति ने बैंक धोखाधड़ी में जीवनभर की बचत गंवा दी हो। घबराहट में वह अपने बैंक फोन करता है, लेकिन उधर से इतनी शांत आवाज अभिवादन करती है कि लगता है अपमान कर रही हो। ‘इसके लिए 1 दबाएं, उसके लिए 2 दबाएं...।’ जब तक रोबोट आठवें विकल्प तक पहुंचता है, बेचारा इंसान भूल ही जाता है कि कॉल किया क्यों था। बाहर से देखने वाले हम लोग अकसर सोचते हैं कि एक जिंदा इंसान तक पहुंचने के लिए हमें दो मिनट तक इस रोबोटिक बकवास को क्यों झेलना पड़ता है। आजकल हेल्पलाइन पर कॉल करना सचमुच किसी सर्वाइवल टेस्ट जैसा हो गया है। आपका दिल तेज धड़क रहा होता है और यह ऑटोमेटेड आवाज नौ चरणों वाला मेन्यू सुनाती रहती है, जैसे बच्चे को सोने से पहले कहानी सुना रही हो। फिर आता है सबसे बड़ा धोखा। अंतत: जब आप किसी असली इंसान से बात करने के लिए 9 दबाते हैं तो रोबोट धीरे-से कहता है, ‘दुर्भाग्यवश, आज कॉल की संख्या बहुत अधिक है। आपका कॉल हमारे लिए महत्वपूर्ण है। 15 मिनट में एक एजेंट आपके साथ होगा। कृपया प्रतीक्षा करें।’ फिर तुरंत होल्ड म्यूजिक शुरू होता है और यह ऐसा लगता है जैसे कोई शरारती बच्चा पियानो कीज पर आगे-पीछे चल रहा हो। मामला तब और बिगड़ जाता है, जब वही ऑटोमेटेड रिमाइंडर इस डरावने म्यूजिक को हर 60 सेकंड में बाधित करता है। यकीन मानिए, जब तक सच में कोई इंसान जवाब देता है, आपकी उम्र दो साल बढ़ चुकी होती है। ज्यादातर लोग जानते हैं कि फोन पर मदद लेने का प्रयास अब कस्टमर सर्विस नहीं रहा, बल्कि धीमी और कई चरणों वाली डिजिटल भूलभुलैया के खिलाफ इंसानी सहनशक्ति की परीक्षा बन चुका है। पूर्व में तेलंगाना साइबर सिक्योरिटी ब्यूरो (टीजीसीएसबी) में कॉल करने वाले पीड़ितों के लिए भी यही कड़वी हकीकत थी। वहां औसतन 27 कॉल होल्ड पर रहती थीं, जिससे धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज कराने और चोरी हुई रकम फ्रीज कराने में बहुत देरी होती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। 1930 साइबर अपराध हेल्पलाइन पर लगाए गए एआई वॉइस असिस्टेंट ने खेल बदल दिया है। इसकी मदद से टीजीसीएसबी बड़ी संख्या में कॉल प्रबंधित कर पा रहा है और इससे कॉलर वेटिंग टाइम जीरो हो गया है। घबराए लोगों को अंतहीन मेन्यू में भटकाने के बजाय यह असिस्टेंट नाम, जन्मतिथि, गंवाई गई रकम, धोखाधड़ी का तरीका और घटना के सही समय समेत अन्य जानकारियां तुरंत जुटा लेता है। इससे शिकायत का रजिस्ट्रेशन टाइम काफी घटा है। और भी अच्छा यह कि कॉलर अंग्रेजी, तेलुगु या हिंदी में स्वाभाविक बातचीत कर सकते हैं। सिस्टम तुरंत इन बहुभाषी संवादों को अंग्रेजी में ट्रांस्क्राइब कर एक व्यवस्थित शिकायत रिपोर्ट बना देता है। यह अत्याधुनिक तकनीक खासकर उन ‘गोल्डन ऑवर’ के दौरान रिपोर्टिंग तेज करने के लिए बनी है, जिन महत्वपूर्ण घंटों में त्वरित कार्रवाई से लेन-देन का पता लगाकर चोरी हुई रकम को ब्लॉक किया जा सकता है। वॉइस क्लोनिंग, डीपफेक, ऑटोमेटेड फिशिंग और क्रिप्टोकरेंसी से जुड़ी धोखाधड़ी जैसे नए टेक खतरों से लड़ने में एआई असिस्टेंट टीजीसीएसबी का सबसे अहम हथियार बन चुका है। इसकी वजह से शिकायतें तेजी से दर्ज हो रही हैं और वित्तीय हस्तक्षेप भी तुरंत हो रहे हैं। इस त्वरित रिपोर्टिंग के बेहद शानदार परिणाम रहे हैं। हेल्पलाइन और अन्य रिपोर्टिंग चैनलों को ऑप्टिमाइज करने से अधिकारियों ने सिर्फ 2025 में ही लगभग 280 करोड़ रुपए की राशि होल्ड करने में सफलता पाई। 29,273 पीड़ितों को 183 करोड़ वापस भी किए गए। अधिकारियों ने बताया कि सिस्टम शुरू होने के बाद से अब तक 53,434 से अधिक पीड़ितों को कुल 399.6 करोड़ रुपए लौटाए गए हैं। मई 2026 तक अतिरिक्त 154.4 करोड़ रुपए भी फ्रीज किए हैं। सबसे प्रभावी यह है कि देशभर में साइबर अपराधों में भारी बढ़ोतरी के बावजूद 2025 में तेलंगाना में ये शिकायतें 3% कम दर्ज हुईं, जबकि देश के बाकी हिस्सों में यह 24% बढ़ी हैं। फंडा यह है कि किसी कार्य में जब मात्रा बढ़ती है तो प्रतिक्रिया की रफ्तार तेजी से घट जाती है। और यहीं पर गति बढ़ाने के लिए तकनीक आगे आती है। संक्षेप में, ‘रफ्तार’ ही तकनीक का दूसरा नाम है।