एन. रघुरामन का कॉलम:किसी दिन ‘कोडी’ कई बुजुर्गों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा होगा
अगर आपकी उम्र 60 से ज्यादा है और आपकी देखभाल करने के लिए कोई नहीं है, लेकिन आप किसी ओल्ड-एज होम में भी नहीं जाना चाहते हैं, और उसके बजाय अपने ही घर में रहना चाहते हैं तो ऐसा सोचने वाले आप अकेले नहीं हैं। अक्टूबर 2025 में दक्षिण कोरिया में हुआ अध्ययन कहता है कि 95% से अधिक बुजुर्ग मनोवैज्ञानिक फायदों के चलते हमेशा उसी घर में उम्र बिताना पसंद करते हैं, जहां दशकों से रहते आए हैं। दक्षिण कोरिया सबसे तेजी से बुजुर्ग होती आबादी वाले देशों में एक है और पिछले साल वह ‘सुपर-एज्ड सोसाइटी’ बन गया। लेकिन उन लोगों का क्या होगा, जिनके बच्चे दूसरे शहरों में या विदेश चले गए हैं या शादी के बाद आपके घर से चले गए? उनकी जगह ‘कोडी’ लेगा। सोच रहे हैं कि ‘कोडी’ कौन है? तो आगे पढ़िए। हम इंसान जहां चंद महीने में बच्चों को जन्म दे सकते हैं, जो बड़े होकर हमारी देखभाल करते हैं, वहीं ‘कोडी’ के पैरेंट्स को उसे दुनिया के सामने लाने में लगभग तीन साल लग गए। इंसानी जुड़ाव को बढ़ावा देने के लिए ‘कोडी’ का विचार क्रिस कुडिया और बेन गोर्टजेल के दिमाग में आया था। ‘कोडी’ का मुस्कराता हुआ चेहरा है, हालांकि उसकी चमकीली भूरी आंखें आपको असहज कर सकती हैं। उसका तीन फीट का फ्रेम, शरारती मुस्कान के साथ चेहरे के दोस्ताना भाव उसे सहज बनाते हैं। हां, वह अमेरिका के सिएटल की कंपनी ‘माइंड चिल्ड्रन’ का एक ह्यूमनॉइड रोबोट है। 11 जून को उसने अमेरिकी अखबार को इंटरव्यू दिया। उससे पूछा गया कि उसके सामने क्या है। बच्चों जैसी आवाज में उसने तुरंत कहा कि ‘स्क्रीनों वाला एक वर्कप्लेस, जहां कुछ नोट्स और रोजमर्रा की चीजें हैं। यह किसी क्लासिक लैब जैसा सेटअप दिखता है, जो विचारों को जीवन में उतारने की अच्छी जगह जैसा लगता है।’ हालांकि आज वह चाय का कप भी नहीं उठा सकता, लेकिन वह आश्वस्त है कि अगले 10 साल में वह सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि बहुत कुछ कर पाएगा। वह कहता है, ‘शायद तब तक मैं एलेवेटर के दरवाजे भी खोल सकूंगा।’ उसके को-फाउंडर्स को भी भरोसा है कि यह रोबोट स्कूलों, अस्पतालों, होटलों और घरों का हिस्सा बनेगा। लोगों को सीखने, जुड़ने और कम अकेलापन महसूस करने में मदद करेगा। लेकिन को-फाउंडर्स का मानना है कि उससे पहले ‘कोडी’ को कई बाधाएं पार करनी होंगी। ‘माइंड चिल्ड्रन’ कंपनी ने इसके विकास के अगले चरण के लिए क्राउडफंडिंग शुरू कर दी है। उसे उम्मीद है कि एक बार लॉन्च होने पर वह इसे इतना सस्ता बना देगी कि अकेले रहने वाले वयस्क इसे खरीद सकें। जब भी ऐसी नई तकनीक बाजार में आती है तो शुरू में वह बेहद अमीर लोगों का खिलौना बन जाती है। आज कुछ होम-रोबोट 20 हजार डॉलर में बिक रहे हैं, लेकिन को-फाउंडर्स चाहते हैं कि ‘कोडी’ की कीमत 10 हजार डॉलर ही हो। दोनों को भरोसा है कि वे ‘कोडी’ के ऐसे इस्तेमाल के बेहद करीब है, जहां वह बुजुर्गों की देखभाल कर सके और उनके अकेलेपन से लड़ सके। होटलों और आर्ट गैलरियों में इसकी पायलट स्टडी चल रही है, ताकि इसके विकास के लिए जरूरी डेटा जुटाए जा सकें। फिर 2027 में ‘कोडी’ का दूसरा संस्करण तैयार किया जाएगा। ऐसे विश्व में, जहां ह्यूमनॉइड मशीनें दुनिया की समझ से भी तेज गति से बढ़ रही हैं, यह हैरानी की बात नहीं होगी कि आने वाले वर्षों में बच्चों से दूर रहने वाले पैरेंट्स या नि:संतान लोगों को ‘कोडी’ जैसे रोबोट उपहार में दिए जाने लगें। ‘कोडी’ पहले से ही आंखों से आंखों का संपर्क करने और भावनात्मक स्थितियों पर प्रतिक्रिया देने में बेहतर है। वह आसपास का माहौल भी समझता है। चंद और कदमों के बाद वह जीवनभर आपकी देखभाल करने वाला ‘सौतेला बेटा’ बन सकता है। ऐसा कितनी जल्दी होगा, उसके को-फाउंडर्स बता सकते हैं। महज 10 साल पहले ही क्या हमने कभी सोचा था कि 25 हजार रुपए की ‘रूम्बा’ मशीन हमारे घरों में झाड़ू-पोंछा करने वाली मेड की जगह ले लेगी? आज रूम्बा आधुनिक शहरी घरों, यहां तक कि मध्यमवर्गीय परिवारों में भी मौजूद है। मेड अब कुक बन कर ज्यादा कमाई कर रही हैं और मशीनें दिन के किसी भी समय बिना शिकायत अपना काम कर रही हैं। फंडा यह है कि आधुनिक मशीनें इंसानों द्वारा निर्मित खालीपन को भरने में पर्याप्त समझदार हो रही हैं। लेकिन क्या वे हमारी भावनात्मक जरूरतों को भी पूरा कर पाएंगी? जवाब सिर्फ समय ही देगा।