एन. रघुरामन का कॉलम:कुछ देना किसी भी रूप में, कहीं भी, किसी के भी द्वारा हो सकता है
फिल्म ‘दीवार’ में अमिताभ बच्चन के हम्माल के किरदार को याद कीजिए, जो हार्बर से गोदाम या ट्रकों तक भारी बोरियां ढोता था? यह 1970 के दशक की बात है। अब 2026 में आइए। शायद आपने एआई का वह विज्ञापन देखा होगा, जिसमें पावरलूम चलाने वाला एक युवा कपड़ा मजदूर बुनाई करते हुए फोन पर एआई का इस्तेमाल करता है। वह इंटरव्यू के जवाबों का अभ्यास करता है और अंतत: जॉब इंटरव्यू में अधिक आत्मविश्वास के साथ अपीयर होता है। मदुरै के अलवरपुरम में दिहाड़ी मजदूर के बेटे पी. मणिमारन इन दोनों दृश्यों का कॉम्बिनेशन हैं। परिवार की बदतर आर्थिक स्थिति के चलते ‘दीवार’ के विजय की तरह उन्होंने भी 10वीं के तुरंत बाद काम शुरू कर दिया। वीकेंड पर भी यह युवा हम्माल शायद ही ब्रेक लेता। शिफ्टों के बीच और वीकेंड पर भी वह टीएनपीएससी की परीक्षा की तैयारी करता था। इसी कड़ी मेहनत का नतीजा था कि उन्होंने पोस्ट ग्रेजुएशन और फिर एमफिल की पढ़ाई पूरी की। 2015 में वह सरकारी सेवा में विलेज एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर बने और बाद में सीनियर रेवेन्यू ऑफिसर के पद तक पहुंचे। सरकारी नौकरी ने उनका जीवन बदल दिया। उन्हें तो यह तक नहीं पता था कि सरकारी नौकरी के लिए टीएनपीएससी परीक्षा पास करनी पड़ती है। फिर एक दोस्त ने उनकी मदद की। मणिमारन यह एहसान चुकाना चाहते थे, लेकिन अपने मित्र की नहीं, बल्कि उन गरीबों की मदद करके, जो जीवन में कुछ बनना चाहते थे। 2018 में मणिमारन ने पड़ोस के युवाओं को सरकारी प्रतियोगी परीक्षाओं के बारे में जागरूक करना शुरू किया और वीकेंड में उन्हें पढ़ाने भी लगे। आज वह पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के नाम पर दो मुफ्त कोचिंग सेंटर चलाते हैं। अब तक इन केंद्रों में एक हजार से ज्यादा युवा ट्रेंड हो चुके हैं, जिनमें से 33 ने ग्रुप-2 और ग्रुप-4 की परीक्षाएं पास की हैं। मणिमारन का मानना है कि शिक्षा ने उनकी पारिवारिक स्थिति बेहतर की तो अब वह उन लोगों को गाइड करेंगे, जो वैसा ही संघर्ष झेल रहे हैं और जिनके पास कोई मार्गदर्शक नहीं है। अगर आप प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी नहीं करा सकते तो फिर स्टेट ट्रांसपोर्ट के बस ड्राइवर एच.ओ. कृष्णमूर्ति के जीवन से सबक ले सकते हैं। बेंगलुरु में कृष्णमूर्ति हर सुबह जब वह सुबह 6:15 बजे डिपो-33 से बस लेकर निकलते हैं तो साई टिफिन्स नाम की जगह पर रुकते हैं। वहां से 10 फूड पैकेट लेकर सीट के नीचे रखते हैं और बस स्टैंड की ओर चल पड़ते हैं। जब तक वह मुख्य बस स्टैंड (मैजेस्टिक) पहुंचते हैं, तब तक हर पैकेट किसी जरूरतमंद के हाथों में पहुंच जाता है। कृष्णमूर्ति बेघर, बेसहारा बुजुर्गों और ऐसे ही दूसरे लोगों को तलाश कर उन्हें गर्मागर्म भोजन देते हैं। वीकली-ऑफ को छोड़ कर रोजाना वे अलग-अलग तरह के पुलाव बांटते हैं। इंतजार करते कई बेघर लोग तो उनकी बस को भी पहचानने लगे हैं और भोजन लेने खुद आगे आ जाते हैं। हर महीने वे 7-8 हजार रुपए खर्च करते हैं और सैलरी मिलने पर होटल का भुगतान कर देते हैं। सुबह के सफर के बाद भी उनका यह दयाभाव जारी रहता है। हर महीने वह डिपो के पास रहने वाली उस बुजुर्ग महिला को राशन देते हैं, जिन्हें स्ट्रोक आ चुका है। कृष्णमूर्ति द्वारा कई वर्षों से चुपचाप किए जा रहे इस दयालुतापूर्ण कार्य पर लोगों का ध्यान तब गया, जब इस रूट की नियमित यात्री रजनी राव ने इस बारे में सोशल मीडिया पोस्ट की। डिपो में भी वह कर्मचारियों के ऐसे समूह का हिस्सा हैं, जो मेडिकल इमरजेंसी में साथियों और उनके परिवारों की मदद के लिए पैसे जुटाते हैं। हाल ही में एक कर्मचारी के बच्चे को ब्रेन ट्यूमर हुआ तो इस समूह ने उपचार के लिए 1.5 लाख रुपए जुटाए। फंडा यह है कि देना इंसानियत का सेलिब्रेशन है। इसके लिए पैसा या समय देना ही जरूरी नहीं, यह सड़क चलते दी गई मुस्कान भी हो सकती है। यह किसी अकेले व्यक्ति की हौसला-अफजाई के लिए कहे गए शब्द भी हो सकते हैं, जैसे ‘आप कैसे हैं?’