एन. रघुरामन का कॉलम:क्या स्मार्ट क्लासेस या स्मार्ट होम्स बच्चों में देखने की लत बढ़ा रहे हैं?
‘इफ देअर आर फैट कैट्स इन योर कॉलोनी, यू नीड टु चेक योर ड्रेनेज सिस्टम’- यह एक रूपक है, जिसे मुथुस्वामी नारायण ने अपनी किताब ‘सक्सेस थ्रू ऑपोजिट्स’ में इस्तेमाल किया है। यहां ‘फैट कैट्स’ उन लोगों के संदर्भ में है, जो सिस्टम का फायदा उठा कर बिना कोई योगदान दिए या अत्यधिक संसाधनों का उपभोग कर मोटे यानी अमीर हो रहे हैं, जबकि दूसरे संघर्ष करते रहते हैं। वहीं ‘ड्रेनेज सिस्टम’ उस बुनियादी ढांचे, प्रक्रियाओं, नियमों या मैनेजमेंट का प्रतीक है, जिस पर कोई संगठन या समुदाय चलता है। 2004 में मैंने अपनी कॉलोनी में इसे व्यावहारिक तौर पर देखा। जब हमने चूहों को भीतर आने से रोकने के लिए पूरा ड्रेनेज सिस्टम कडप्पा स्टोन से ठीक करवाया तो बिल्लियां भी खाना ढूंढने कहीं और चली गईं और वहां से गायब हो गईं। मुझे यह रूपक हाल ही में एक एजुकेशनल इंस्टीट्यूट के दौरे में याद आया, जहां ज्यादातर कक्षाओं को तो गैजेट्स से जुड़े स्मार्ट क्लासरूम में बदल दिया गया, लेकिन गणित और रीडिंग एबिलिटी में उसका स्कोर कम था। रिसर्च बताती है कि अत्यधिक स्मार्ट क्लास और गणित व शब्दों को याद रख पाने की क्षमता में कमी का सीधा संबंध है। दरअसल, जब बच्चा स्क्रीन के जरिए ज्ञान या कहानियों को अनुभव करता है तो दाएं टेम्पोरोपैरिएटल जंक्शन जैसे दिमाग के हिस्सों में गतिविधि कम होती है। किताब पढ़ते समय दिमाग का यही हिस्सा एक्टिव होता है, जहां लैंग्वेज और लिटरेसी की नींव बनती है। जब स्मार्ट स्क्रीन के जरिए आसान तरीका मिलता है तो दिमाग भी ‘फैट कैट’ की तरह आसान रास्ता चुन लेता है। ‘स्मार्ट क्लास’ का मकसद शिक्षक को एक अतिरिक्त संसाधन देना था, ताकि वे क्लास को आकर्षक, जीवंत और इंटरैक्टिव बना सकें और बच्चे विषय को जल्दी समझ सकें। लेकिन शिक्षण सामग्री के लिए शिक्षकों की गूगल पर अत्यधिक निर्भरता के चलते स्कूली बच्चों में हर छोटी चीज के लिए वीडियो स्क्रॉलिंग की आदत पड़ गई। इधर, घरों में भले ही पैरेंट्स अपने बच्चों के लिए शॉर्ट्स कंटेंट ब्लॉक कर सकते हैं, जिससे उन्हें कंट्रोल मिलता है कि बच्चे क्या देखें। फिर भी चौबीसों घंटे इंटरनेट से जुड़े ‘स्मार्ट होम्स’ में बच्चे होमवर्क के दबाव या अन्य कारणों से पहले से ज्यादा वीडियो देख रहे हैं। इस सुविधा के कारण बच्चे मॉनिटर से भी चिपके रहते हैं और बेडरूम से ही वर्क फ्रॉम होम एवं अन्य कार्यों को निपटा रहे पैरेंट्स को डिस्टर्ब नहीं करते। दोनों ही मामलों में, भारत में ऐसा कोई सिस्टम नहीं है, जो मॉनिटर करे कि बच्चे रोज कितने वीडियो देख रहे हैं। मैंने एक अमेरिकी अखबार में पढ़ा कि 7वीं के एक बच्चे ने दिसंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच 13 हजार वीडियो देखे। इसमें ऐसे गेम्स भी थे, जिन्हें खेलने की अनुमति नहीं थी। 10वीं के एक स्टूडेंट ने 2 घंटे 40 मिनट में 200 कंटेंट देख डाले। दूसरी कक्षा के एक स्टूडेंट ने तो हैरतअंगेज तौर पर दो महीने में 700 वीडियो देखे। हैरान करने वाला ये डेटा उन विकसित देशों का है, जहां हर स्टूडेंट के पास गैजेट्स हैं।सोच रहे हैं कि बच्चों में सबसे पॉपुलर सोशल मीडिया कौन-सा है? बेशक- यूट्यूब। बीबीसी जैसे मीडिया संस्थान भी यंग ऑडियंस को आकर्षित करने के लिए अपने न्यूज ब्रॉडकास्ट यूट्यूब पर दे रहे हैं। ऐसे में किसी भी विजुअल के लिए बच्चों के बीच यूट्यूब सबसे पसंदीदा सर्च इंजन बन गया है। अगर आप चाहते हैं कि बच्चों का फ्रंटल लोब तेज काम करे, उनका अटेंशन टाइम बढ़े और दिमाग का विजुअल लैंग्वेज प्रोसेसिंग एरिया मजबूत हो तो उनकी दैनिक गतिविधियों में स्क्रीन टाइम की जगह किताबें जोड़िए। फंडा यह है कि बच्चों में सोशल मीडिया एडिक्शन के लिए किसे जिम्मेदार ठहराएं- स्कूल या पैरेंट्स? फिलहाल इसका स्पष्ट जवाब नहीं है। पलड़ा भले ही किसी भी ओर झुके, यानी ज्यादा वीडियो स्मार्ट क्लास में हों या स्मार्ट होम्स में, अंतत: इसका बुरा असर भावी पीढ़ी पर ही पड़ेगा।