एन. रघुरामन का कॉलम:छोटी-सी उपलब्धि पर बच्चे ‘डेंडेलियन का ताज’ क्यों पहन लेते हैं?
बहुत पहले मैं किसी काम से मुंबई के शिवाजी पार्क गया, जहां से सचिन तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी निकले हैं। इसी वजह से क्रिकेट कोचिंग के लिए यहां आने वाले हर बच्चे की मां अपने बच्चे में ‘सचिन’ देखने लगी। जब तक बेटा प्रैक्टिस पूरी न कर ले, वे घंटों तक साइडवॉल पर बैठी रहतीं। वहां मैंने एक मां को अपने बेटे की तरफ चिल्लाते हुए सुना, ‘गो...रन... यू कैन।’ जैसे ही बच्चे ने बॉलिंग एंड पर पहुंच कर शिवाजी पार्क में पहला रन पूरा किया, जिसे मां वीडियो रिकॉर्ड कर रही थीं, उसने शाबासी के लिए मां की ओर देखा। मां के प्रतिक्रिया देते ही लड़का अपनी जगह छोड़कर मां की ओर ऐसे भागा, जैसे कोई बड़ी उपलब्धि पा ली हो और पानी पिलाने के लिए कहा। आपको अन्य पैरेंट्स की आंखें देखनी चाहिए थीं, जो मां पर टिक गईं। जबकि मां की आंखें लगातार बेटे को ऐसा न करने की चेतावनी दे रही थीं। कोच जानता था कि एक बच्चे ने भी उसके निर्देशों की अनदेखी की तो जल्द ही पूरे मैदान में अव्यवस्था फैल जाएगी। वह मां उस वक्त पैरेंटिंग की दो प्रतिस्पर्धी भावनाओं में फंसी थी। एक तरफ वह एक दिन बेटे को 10 नंबर की टीशर्ट में देखना चाहती थीं, और ऐसा सपना देखने का हक सबको है। दूसरी तरफ, एक मां के रूप में वह परखना चाहती थीं कि क्या उनका बेटा तेज गर्मी में खड़े रह कर यह कठिन खेल सीख सकता है? बाद में कोच ने मुझे बताया कि वह बच्चा आखिरकार क्रिकेट कोचिंग से बाहर हो गया और इंडोर स्टेडियम में टेनिस खेलने लग गया। तब मैंने उस मां की कल्पना की, जो अब बच्चे के रोजर फेडरर बनने का सपना देख रही होगी– कई खिताब जीत चुका एक शांत, लेकिन शानदार खिलाड़ी। मुझे यह घटना तब याद आई जब सोमवार को मैं एक प्रमुख यूनिवर्सिटी में अर्पित, दुर्गेश, अमन, निलेश, जयदीप और विशाल के अलावा 10 अन्य स्टूडेंट्स से मिला। इन छहों में एक बात समान थी- वे किसान परिवारों से थे और शायद अपने परिवारों के पहले ग्रेजुएट थे। उन 16 स्टूडेंट्स के जीवन को दिशा देने के लिए उन्हें मेरे समक्ष लाया गया, क्योंकि वे बिना यह समझे इधर-उधर भटक रहे थे कि ग्रेजुएशन खत्म होने तक आखिर उन्हें हासिल क्या करना है। जैसे ही मैं उनके कमरे में घुसा, मुझे लगा कि ये लड़के ‘डेंडेलियन का ताज’ पहने हुए हैं। अंग्रेजी के इस मुहावरे में ‘डेंडेलियन का ताज’ का अर्थ दो मुख्य विषयों में बांटा जा सकता है। पहला- डेंडेलियन बहुत मजबूत और किसी भी जगह सबसे पहले उगने वाले पौधे हैं। यहां तक कि ये कंक्रीट तोड़ कर भी उग जाते हैं। आयुर्वेद में इसे दुग्धफेनी या सिंहपर्णी कहते हैं। और दूसरा, जिन ठंडे, पहाड़ी इलाकों में यह सर्वाधिक पाया जाता है, वहां गरीब बच्चों को इसके फूलों का ताज पहनकर राजा-रानी का खेल खेलते देखा जा सकता है। इस प्रकार वे जीवन के संघर्ष, आनंद और भावनात्मक सुकून का उत्सव मनाते हैं। यह बचपन में वसंत के बेफिक्र दिनों की याद दिलाता है। इसे पहनना मानो खेल, सुकून और अपने प्राकृतिक रूप से दोबारा जुड़ने का निमंत्रण होता है। उन 16 स्टूडेंट्स के लिए इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी में पहुंचना ही एक उपलब्धि थी, जैसे शिवाजी पार्क में एक रन बनाने पर उस बच्चे को लगा कि अब वह एक गिलास पानी का हकदार है और गंभीर खेल बीच में छोड़कर मां की तरफ भाग गया। मुझे उन 16 छात्रों के साथ 90 मिनट बिताने पड़े और उन्हें समझाया कि अगले तीन सालों के परिणाम से ही उनका आकलन किया जाएगा। जब उन्होंने वादा किया कि आगामी महीनों में वे उल्लेखनीय प्रगति करके दिखाएंगे और मेरे संपर्क में रहेंगे तो मुझे लगा कि मेरी बातों का उन पर अच्छा असर पड़ा है। फंडा यह है कि स्टूडेंट्स छोटी-सी उपलब्धि पर ही ‘डेंडेलियन का ताज पहन लेते हैं’, क्योंकि हम माता-पिता लगातार उनसे प्रदर्शन की उम्मीद करते रहते हैं। जबकि ऐसे समय में शांत रहकर कहना चाहिए कि ‘यह सफलता की ओर पहला कदम है।’