नंदितेश निलय का कॉलम:क्या यह संकट बीतने के बाद भी हम सादगी का सबक याद रखेंगे?
ऊर्जा संकट के बीच देश में विभिन्न क्षेत्रों के लीडर्स अपनी बड़ी कारों और उसके काफिले को छोड़ साइकिल या पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर सवारी करते दिखे। 1970 के दशक के दौरान भी वह दौर आया था, जब तेल संकट के बीच संसार के कई देशों में परिवहन व्यस्था में बदलाव आया। तब नीदरलैंड, डेनमार्क और यूरोप के कई देशों में साइकिल-लेन का विस्तार किया गया और सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दी गई। भारत में भी अब प्रधानमंत्री ने नागरिकों से पेट्रोल और डीजल का इस्तेमाल कम करने, मेट्रो और बसों का उपयोग करने या साइकिल चलाने का आग्रह किया है। लेकिन यह बदलाव सिर्फ थोड़े समय के लिए है या यह भविष्य में इस देश का परिवहन-व्यवहार भी बन जाएगा? यह जो वीआईपी कल्चर है और जो गाड़ियों के काफिले धूल उड़ाते भागते हैं, क्या उनकी गति कुछ धीमी हो पाएगी? आखिर हमें मानना पड़ेगा कि वो सारे लोग जो अभी तक बड़ी-बड़ी गाड़ियों में चलते रहे, उन्हें पब्लिक ट्रांसपोर्ट को उपयोग में लाने से कोई गुरेज नहीं और न ही अपने प्राइवेट जेट को छोड़ आम उड़ान भरने से। यह कितना संतोषजनक होगा कि खास लोग भी आम लोगों की तरह घर से ऑफिस का सफर कर सकते हों और उन्हें किसी तरह का विशिष्टता-बोध नहीं हो। लेकिन जिस दिन युद्ध रुकेगा, जिस दिन होर्मुज जहाजों को हंसते-हंसते विदा करेगा, क्या उसके बाद भी सफर का साधन वही साइकिल और पब्लिक ट्रांसपोर्ट रहेगा? क्या ‘ऑस्टेरिटी’ (मितव्ययिता) एक तात्कालिक बदलाव का ही पहलू नहीं बनेगा, बल्कि वह जीवन जीने का आचरण भी बन पाएगा? ऑस्टेरिटी को दो अर्थों में समझा जाता है- पहला जीवन‑शैली के रूप में और दूसरा आर्थिक नीति के अर्थ में। जीवन‑शैली के रूप में ऑस्टेरिटी का अर्थ हिंदी में सादगी, तपस्या, संयम और कठोरता जैसे गुण हैं। यानी भौतिक सुखों, फिजूल के खर्च और जरूरत से ज्यादा आराम को छोड़कर सादा जीवन जीना। आर्थिक संदर्भ में अगर हम देखें तो ऑस्टेरिटी का तात्पर्य यह है कि खर्च कम किया जाए और जो खर्च कर रहे हैं, उनमें भी कटौती की गुंजाइश रहे। लेकिन युद्ध के समाप्त होने के बाद ऑस्टेरिटी का कौन-सा अर्थ समाज में प्रासंगिक रह जाएगा? क्या हम जीवन को सादगी से जीने की कोशिश करेंगे और अपनी आदतों में अत्यधिक भौतिक सुखों और खर्चों से बचेंगे? खैर, कोई भी संकट सकारात्मक बदलाव की गुंजाइश तो पैदा करता ही है। कोविड के समय हमने यह महसूस किया कि उपभोक्ता बना व्यक्ति कैसे अपने आप को उस मितव्ययिता के साथ रखना चाह रहा था, जो सादगी और संयम से तो निर्देशित हो ही रही थी, साथ-साथ हर तरह के आर्थिक आकर्षण से भी कोसों दूर थी। जीने की जिजीविषा थी और जीना एक साहसिक कार्य ही माना गया। वह दौर तमाम तरह के इंफ्लुएंसर्स को दिन-रात सुनता रहा और खुद को मोटिवेट भी करता रहा। कारें गैरेज में खड़ी रहीं और कभी-कभार गर कुछ घुमा तो वह साइकिल का पहिया ही था। आज फिर हमारे देश में हर उस व्यक्ति के लिए यह एक मौका है कि वह भविष्य में भी अपने आप को उस मितव्ययिता के इर्द-गिर्द रखें। क्योंकि कहा जाता है कि हर बादल में चांदी की रेखा होती है। यह कितना कमाल का दृश्य होगा, जब तेल संकट के समाप्त होने के बाद भी एक आमजन की तरह लीडर्स पब्लिक ट्रांसपोर्ट या किसी साइकिल से आते-जाते दिखेंगे। किसी बड़ी कंपनी के चेयरमैन भी कभी मेट्रो में बैठे दिख जाएंगे। यह भी देखना संतोषजनक होगा कि संसाधनों में शक्ति ढूंढता समाज वास्तविक शक्ति सादगी वाली जीवनशैली में पा रहा होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)