पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:एक-दूसरे की देह का शोषण काम-ऊर्जा का दुरुपयोग है
अपराध वेश बदलने में बड़ा माहिर होता है। हर दौर में अपराध नई-नई शक्ल लेकर आता है। दार्शनिकों ने कहा है अपराध मिटता नहीं है, छुप जाता है और मौका मिलने पर सामने आ जाता है। आज राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी दिवस मनाया जाता है। हमने एक पूर्व प्रधानमंत्री को इस दिन खोया था। आतंकवाद भी अपराध का एक चेहरा है। उस पर तो सरकार जैसे-तैसे काबू पा रही है, लेकिन इन दिनों एक नई शक्ल सामने आ रही है। किशोर और तरुण उम्र के युवक-युवती दैहिक अपराध में लिप्त हो रहे हैं। एक-दूसरे के शरीर का शोषण काम-ऊर्जा का दुरुपयोग है। स्त्रियों को पुरुषों से बराबरी करनी चाहिए, लेकिन पीड़ा तब हो रही है जब स्त्रियां अपराध के क्षेत्र में भी पुरुषों से बराबरी कर रही हैं। अब तो लड़कियां भी छात्रा के रूप में किसी और की परीक्षा दे देती हैं। ये शिक्षा जगत का बड़ा अपराध है। न्याय-व्यवस्था के भीतर भी द्वंद्व है इस बात को लेकर कि पॉक्सो में 90% केस ऐसे सामने आए, जिसमें युवती की स्वीकृति थी और बाद में उसे अपराध की शक्ल दी गई। ये लक्षण देश के दिव्य देह-स्वरूप पर कोढ़ की तरह हैं।