एन. रघुरामन का कॉलम:जीवन-गुणवत्ता बेहतर करने के लिए रोजमर्रा के इनोवेशन जरूरी हैं

Aug 27, 2026 - 06:13
एन. रघुरामन का कॉलम:जीवन-गुणवत्ता बेहतर करने के लिए रोजमर्रा के इनोवेशन जरूरी हैं
हममें से कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि आज भी हमारे देश में खाने की मिलावट एक गंभीर समस्या है। वरना पूरे भारत में लोग महाराष्ट्र के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) कमिश्नर तुकाराम मुंढे की चर्चा नहीं कर रहे होते, जिन्होंने फिर देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। असल जिंदगी के सिंघम कहे जाने वाले मुंढे ने अपनी दो दशक की सेवा में 25 तबादले झेले हैं। उन्होंने मई 2026 में एफडीए में कामकाज संभाला और जल्द ही पूरे राज्य में खान-पान की जगहों और खाद्य निर्माताओं के यहां हाई-प्रोफाइल छापेमारी कर अपनी मौजूदगी का अहसास करा दिया। उनका फोकस साफ था- मिलावटी खाना और अस्वच्छ तरीकों का पर्दाफाश करना। उनकी कार्रवाई ने कई बड़े क्लबों को अपने ड्रॉइंग रूम में लौटकर फूड-हाइजीन से जुड़े तौर-तरीकों को रिव्यू करने और उन्हें बेहतर बनाने को मजबूर कर दिया। मेरे लिए मिलावट एक और अवसर पेश करती है। कल्पना कीजिए, यदि कोई 500-1000 रुपए तक का फूड-टेस्टिंग डिवाइस बना दे। स्मार्टफोन से जुड़ा एक छोटा-सा रीडर, जो डिस्पोजेबल स्ट्रिप्स या सेंसर की मदद से खाने की कुछ चुनिंदा खासियतों की जांच कर सके और सिर्फ इतना बताए कि ‘संभावित मिलावट का पता चला, लैब कन्फर्मेशन जरूरी है।’ यह भविष्य का कदम हो सकता है। यहां ‘संभावित’ शब्द अहम है। ऐसा डिवाइस स्क्रीनिंग टूल होना चाहिए, न कि गलत तरीके से खुद को ही लैब बताए। इसी तकनीक का इस्तेमाल स्कूल, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन, फूड मार्केट और नगर निकाय भी कर सकते हैं। मैं आज रोजमर्रा के इनोवेशन की बात इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि इसी हफ्ते मुझे पता चला कि लखनऊ के मेदांता हॉस्पिटल में इमरजेंसी मेडिसिन एंड ट्रॉमा केयर के डायरेक्टर डॉ. लोकेन्द्र गुप्ता के नेतृत्व वाली इमरजेंसी फिजिशियनों की टीम को पेटेंट ऑफिस से एक इंटीग्रेटेड इमरजेंसी ट्रांसपोर्ट स्ट्रेचर के लिए डिजाइन रजिस्ट्रेशन मिला है। इस स्ट्रेचर का उद्देश्य गंभीर मरीजों को अस्पताल में एक से दूसरी जगह ले जाते समय उनकी देखभाल को बेहतर बनाना है। इस इनोवेशन की शुरुआत किसी लैब में नहीं, बल्कि डॉक्टरों द्वारा देखी गई एक समस्या से हुई- क्या होगा यदि किसी मरीज को ले जाते वक्त सीपीआर की जरूरत पड़ जाए? इसी फेल्योर पॉइंट को ध्यान में रख कर टीम ने डिजाइन तैयार किया। इस स्ट्रेचर को छह मोड में कॉन्फिगर किया जा सकता है, जिसमें आईसीयू, इमरजेंसी/सीपीआर, रेडियोलॉजी, सर्जिकल प्रोसिजर, चेयर और ट्रांसपोर्ट मोड शामिल हैं। इसमें एक्सपेंडेबल सीपीआर प्लेटफॉर्म, इंटीग्रेटेड पेशेंट मॉनिटरिंग सिस्टम, ऑक्सीजन और सक्शन एक्सेस, इमरजेंसी स्टोरेज, सेफ्टी हार्नेस, रेडियोलुसेंट इमेजिंग कैपेबिलिटी, चार यूटिलिटी पोर्ट्स, हाइट एडजस्टमेंट और बैटरी बैकअप जैसी सुविधाए हैं। टीम के मुताबिक, इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गंभीर मरीजों को अस्पताल में इधर-उधर ले जाते वक्त भी इमरजेंसी और क्रिटिकल केयर की सुविधाएं निर्बाध रूप से मिलती रहें। इस इनोवेशन को देखभाल में रुकावट के बजाय इलाज की निरंतरता के तौर पर देखा जाना चाहिए। डिजाइन रजिस्ट्रेशन के बाद अब टीम संभावित क्लिनिकल यूज के लिए इंजीनियरिंग डेवलपमेंट, टेस्टिंग और प्रमाणीकरण की योजना बना रही है। इसलिए फूड सेफ्टी समस्या का आधा ही हिस्सा है, दूसरा हिस्सा खाद्य पदार्थों की खराबी है। आईसीएआर का अनुमान है कि भारत में फसल कटाई के बाद लगभग 6-18% तक खराबी होती है। जबकि देश में सालाना 315 मिलियन टन से ज्यादा फल-सब्जी पैदा होती है। इसका मतलब है कि इनोवेशन की जरूरत सिर्फ पैदावार में ही नहीं, बल्कि खाने के खेत से प्लेट तक पहुंचने के बीच भी है। एक आइडिया इंटेलिजेंट प्रोड्यूस क्रेट का है। साधारण क्रेट की जगह ऐसा क्रेट, जिसमें लगे किफायती सेंसर तापमान, नमी, कंपन, ट्रांजिट की अवधि और चुनिंदा पैदावार के लिए एथिलीन स्तर की निगरानी करें। आखिर में ऐसी चेतावनी दे सकें कि ‘टमाटर जल्दी खराब होने वाला है।’ टेक्नोलॉजी स्टूडेंट्स के पास ऐसे व्यावहारिक अविष्कार करने का बड़ा अवसर है, जो मौतों को रोकें, जीवन गुणवत्ता बनाए रखें, खाना सुरक्षित रखें और हर उम्र के लोगों के लिए रोजमर्रा की व्यवस्थाओं को सुरक्षित बनाएं। उनके इनोवेशन का मकसद हमेशा सुरक्षा ही नहीं होना चाहिए। यह किसी बुजुर्ग या दिव्यांग व्यक्ति की गरिमा, किसी का समय या पैसा और सबसे बढ़कर सुविधा जैसा क्षेत्र हो सकता है। फंडा यह है कि हमारे देश की आबादी की रोजमर्रा की जिंदगी को देखते हुए ऐसे आसान तरीके विकसित करने में इनोवेशन की बहुत गुंजाइश है, जो हमारे आसपास खुशहाल समाज बना सकें।