एन. रघुरामन का कॉलम:टेढ़ा खड़ा रहना कोई गलत नहीं है, लेकिन सही है।

Aug 25, 2026 - 06:43
एन. रघुरामन का कॉलम:टेढ़ा खड़ा रहना कोई गलत नहीं है, लेकिन सही है।
सबसे पहले उन विज्ञापन जिंगल्स को याद करें, जो ‘टेढ़ा है…’ से शुरू होते थे या वे विज्ञापन, जो ‘…सही है’ पर खत्म होते थे? और कल्पना कीजिए कि जब आप 3 साल के थे तो कैसे आंखें बंद करके एक पैर पर सारस की तरह खड़े होते थे, दूसरा पैर किक मारने के लिए तैयार रखते थे। दोनों हाथों को फैलाकर खुद को ऐसा दिखाते थे जैसे कोई प्लेन टेक-ऑफ के लिए तैयार हो और आखिर में दोनों पैरों से जंप करके सोफे पर चढ़ जाते थे। जब हम बच्चे थे तो यह खेल कितना आसान था। लेकिन अगर आप 60-प्लस की उम्र में ऐसा करें तो पैर डगमगा सकते हैं और टखने कांप सकते हैं। हो सकता है आप दाएं-बाएं झूल जाए और आखिर में आगे की ओर जा गिरें। विज्ञान कहता है कि लंबी उम्र के लिए जरूरी बैलेंस के लिए सिंगल-लेग एक्टिविटी सबसे अच्छी ट्रेनिंग मानी जाती है। ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में प्रकाशित 2022 के एक अध्ययन के अनुसार 51 से 75 वर्ष की उम्र के ऐसे 84% लोग, जो आंखें खुली रखकर कम से कम 10 सेकंड तक एक पैर पर खड़े नहीं हो सके, उनमें मृत्यु का जोखिम अधिक पाया गया। 2024 के मेयो क्लिनिक के एक अध्ययन के अनुसार सिंगल-लेग बैलेंस टेस्ट को न्यूरोमस्कुलर एजिंग का एक प्रमुख संकेतक भी माना जाता है। शोध का निष्कर्ष था कि कोई व्यक्ति- पुरुष या महिला- कितनी देर तक एक पैर पर बैलेंस बनाए रख सकता है, यह उम्र बढ़ने के बाकी मानकों की तुलना में सबसे विश्वसनीय संकेतक बनकर सामने आया है। उम्र बढ़ने के साथ हम संतुलन की समस्या को अकसर यह कहकर नजरअंदाज कर देते हैं कि ‘अरे, यह तो उम्र बढ़ने की वजह से है।’ उम्र संबंधी समस्याएं तो होंगी, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम इसमें सुधार नहीं कर सकते। विकसित देशों में बहुत-सी ‘बैलेंस सोसाइटीज’ हैं और वहां डॉक्टर उम्रदराज लोगों में संतुलन की समस्या का पता लगाते हैं। वे विविध कार्यक्रमों के जरिए उनके गिरने से बचाव और संतुलन में सुधार पर जोर देते हैं। जरूरी नहीं कि संतुलन सिर्फ बुजुर्गों के लिए महत्वपूर्ण है। यह युवाओं की परफॉर्मेंस को भी सुधारता है। जिस स्ट्रेंथ ट्रेनिंग की हम बात करते हैं, वो बैलेंस के सिद्धान्त पर ही आधारित है, क्योंकि मांसपेशियों से स्टेबलिटी और मोबिलिटी को सहारा मिलता है। रोजमर्रा की जिंदगी में एक संतुलित मस्कुलोस्केलेटल सिस्टम व्यक्ति को असामान्य मूवमेंट पैटर्न से बचाता है। ऐसा पैटर्न नॉन-एथलीट्स लोगों में भी इंजरी का कारण बन सकता है। हमें यह समझना जरूरी है कि बैलेंस हमारे शरीर की संवेदी प्रणालियों के एक साथ काम करने का जटिल-सा मेल है- ऑक्युलर सिस्टम (दृष्टि), गुरुत्वाकर्षण पर निर्भर वेस्टिब्युलर सिस्टम (अंदरूनी कान ) और प्रोप्रियोसेप्शन (शरीर की स्थिति के बारे में जागरूकता)। यही कारण है कि जब आप बैलेंस एक्सरसाइज में आंखें बंद कर लेते हैं तो इसे करना कठिन हो जाता है, क्योंकि दिमाग को तीन के बजाय दो ही संवेदी अंगों से जानकारी मिल पाती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि बैलेंस में न्यूरोमस्कुलर कोऑर्डिनेशन भी शामिल होता है, यानी आपका मस्तिष्क और शरीर कितना बेहतर कम्युनिकेट कर पाते हैं। यह कई सारे कारकों पर निर्भर होता है। इसीलिए बैलेंस ट्रेनिंग को ब्रेन ट्रेनिंग भी कहते हैं। इसलिए टारगेटेड बैलेंस एक्सरसाइज को डेली रूटीन में या कम से कम हफ्ते में तीन-चार बार तो करना ही चाहिए। एक सीध में चलें और अगर पलक झपकानी पड़े तो झपकने दें। टीवी देखते समय विज्ञापन के दौरान 30 सेकंड तक एक पैर पर खड़े रहें। अगले विज्ञापन में दूसरे पैर पर खड़े हों। छह महीने में शरीर इन प्रक्रियाओं को याद रखना शुरू कर देगा। फिर आगे बढ़िए, लिविंग रूम में थोड़ी जगह बनाकर तीन साल के बच्चे की तरह खड़े हो जाइए, जो विमान की तरह टेक-ऑफ के लिए तैयार है। यह मत भूलिए कि एक पैर पर खड़े होना यकीनन इस बात का अप्रत्याशित संकेतक है कि हम कितने साल जिएंगे। फंडा यह है कि ‘टेढ़ा खड़ा रहना कोई गलत नहीं है, लेकिन सही है।’ यह सिर्फ ज्यादा लंबा जीने की बात नहीं, बल्कि गुणवत्ता वाली जिंदगी जीने की है। बैलेंस हर उम्र में गेमचेंजर है।