एन. रघुरामन का कॉलम:महीने में कम से कम एक बार अपने ‘कैफे ऑफ मिस्टेकन ऑर्डर्स’ में जाइए
उन्होंने मुझसे पूछा, ‘तुम कॉफी लोगे या चाय?’ मैंने जवाब दिया, ‘मुझे कॉफी ज्यादा पसंद है।’ वह रसोई में गईं और चाय लेकर आ गईं। मैं मुस्कुरा दिया। उन्हें लगा कि कुछ गड़बड़ है तो उन्होंने चिंतित होकर पूछा कि ‘क्या यह अच्छी नहीं है?’ मैंने उन्हें भरोसा दिलाया, ‘बहुत अच्छी है। मुझे चाय पसंद है, खासकर आपकी बनाई हुई।’ यह सुनकर वह सहज हुईं और चाय पीने बैठ गईं। मैं बचपन से इन आंटी को जानता हूं। वह मेरी मां की सबसे अच्छी दोस्त और पिता के सबसे अच्छे मित्र की पत्नी थीं। नागपुर की संगम चॉल में हम पड़ोसी थे, जिनके मकानों के बीच की दीवार एक ही थी। वह कॉलोनी आज मौजूद नहीं है। फिर उन्होंने पूछा कि ‘तुम्हारे साथ घर पर कौन रहता है?’ मुझे पूरी कहानी फिर बतानी पड़ी कि उनकी प्यारी दोस्त, मेरी मां तो बहुत पहले गुजर चुकीं। मेरी बेटी की शादी हो चुकी है और अब घर में बस मैं और मेरी पत्नी रहते हैं। अगर मेरा जवाब सिर्फ ‘मैं और मेरी पत्नी’ होता तो जरूर वे अगला सवाल करतीं कि ‘तुम्हारे माता-पिता को क्या हुआ?’ मैं जब भी भोपाल जाता हूं तो कमला सुंदरेसन आंटी से जरूर मिलता हूं। इस अक्टूबर वे 86 की हो जाएंगी। पिछले 45 सालों से वह भोपाल के 1100 क्वार्टर्स स्थित मशहूर हनुमान मंदिर के सामने वाली गली में रहती हैं। इन मुलाकातों की खट्टी-मीठी खूबसूरती यह है कि उन्हें अब याद नहीं कि मैं कौन हूं, हालांकि मैं उन्हें 66 साल से जानता हूं। बचपन में वे मुझे खाना खिलाती थीं और मां के साथ मेरी देखभाल करती थीं, फिर भी उन्हें मेरा नाम तक याद नहीं। पिछले रविवार मैं दो घंटे उनके साथ बैठा और एक बार भी उन्होंने मेरा नाम नहीं लिया। जब उनके गोद लिए बेटे राहुल ने मजाक में मुझे पहचानने के लिए कहा तो वे मुस्कुराईं और बोलीं, ‘इन्हें कौन नहीं जानता?’ उनके साथ बिताए समय से मुझे जापान का ‘रेस्तरां ऑफ मिस्टेकन ऑर्डर्स’ याद आया। यह एक अनोखा सोशल पॉप-अप है, जिसके पूरे वेट-स्टाफ में डिमेंशिया के साथ जी रहे लोग हैं। पॉप-अप का मतलब है कि यह स्थायी रेस्तरां न होकर टोक्यो, क्योटो और शिजुओका जैसे शहरों में कुछ समय के लिए लगता है। ग्राहक जानते हैं कि वहां लगभग 40% ऑर्डर गलत आ सकते हैं, फिर भी वे जाते हैं क्योंकि वहां अपनापन, स्वीकार्यता और हल्के-फुल्के मनोरंजन का माहौल होता है। 2017 में टीवी डायरेक्टर शिरो ओगुनी ने इसकी स्थापना की थी। इसका मकसद डिमेंशिया को लेकर बने पूर्वग्रहों को तोड़ना और यह दिखाना है कि इसके साथ जी रहे लोग भी समाज के सक्रिय और सक्षम सदस्य हैं। वहां लोगों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि अगर ऑर्डर गलत आ जाए तो नाराज होने के बजाय जो टेबल पर आ गया, उसका आनंद लें। वहां का डाइनिंग रूम गहरी मानवीयता से भरा है। स्टाफ के लिए यह बातचीत घुलने-मिलने का मौका देती है, अकेलापन घटाती है और जीवन के उद्देश्य का अहसास कराती है। आंटी अब सिर्फ पुरानी साड़ियां ही पहनती हैं। उनसे पूछो कि नई साड़ियों का क्या करेंगी तो कहती हैं कि ‘मुझे इसमें आराम मिलता है।’ वह अपनी प्लेट धोने बाथरूम में चली जाती हैं, क्योंकि उन्हें कई दशक पहले संगम चॉल के बैकयार्ड में प्लेटें धोना याद है। वह हर कामवाली पर आरोप लगाती हैं कि वे खड़ी होकर समय बर्बाद कर रही हैं, काम नहीं करतीं। जबकि राहुल ने उन सभी को निर्देश दे रखे हैं कि आंटी पर नजर रखें, उन्हें कंपनी दें ताकि उन्हें अकेलापन महसूस न हो। यही कारण है कि हमें डिमेंशिया से जूझ रहे अपने प्रियजनों से मुलाकात को यह कह कर नहीं टालना चाहिए कि ‘क्या फायदा? वे हमें पहचानते भी नहीं हैं।’ हमें उनसे मिलने जाना चाहिए, क्योंकि ‘हम उन्हें पहचानते हैं।’ फंडा यह है कि अपने निजी ‘कैफे ऑफ मिस्टेकन ऑर्डर्स’ (डिमेंशिया से पीड़ित कोई भी परिचित) में जरूर जाइए, वहां मिलने वाली डिश, ड्रिंक और बातचीत शायद वैसी न हो, जैसी आपने मांगी थी, लेकिन वहां जाने से आपके दिल को सुकून जरूर मिलेगा।