एन. रघुरामन का कॉलम:शिक्षित बेटी पूरी अगली पीढ़ी को शिक्षित और आर्थिक रूप से सुरक्षित करती है

Jun 1, 2026 - 06:06
एन. रघुरामन का कॉलम:शिक्षित बेटी पूरी अगली पीढ़ी को शिक्षित और आर्थिक रूप से सुरक्षित करती है
लैपटॉप के सामने बैठी गृहिणी स्पष्टत: उत्साह से भरी आवाज में अपने पति को आवाज देती है, ‘भास्कर, हमारा पहला ऑर्डर।’ पति स्क्रीन की ओर दौड़ते हैं, जैसे उन्हें सुनी हुई बात पर यकीन न हो। उनके नए चटनी के कारोबार को पहला ऑनलाइन ऑर्डर मिला है। यह दृश्य कल समाप्त हुए आईपीएल के दौरान दिखाए गए लोकप्रिय विज्ञापन ‘रेड्डी वर्सेस रिटायरमेंट’ का है, जिसमें एक रिटायर्ड कपल एआई की मदद से कारोबार शुरू करता है। यह तकनीक लेबल और पैकेजिंग डिजाइन से लेकर उत्पादों का प्रचार करने वाली वेबसाइट तक बना देती है। यह विज्ञापन मजबूत संदेश देता है कि कुछ नया शुरू करने और परिवार में आर्थिक योगदान देने के लिए कभी बहुत देर नहीं होती। लेकिन आठ साल पहले महाराष्ट्र के बारामती की 30 वर्षीय मनीषा कांबटे के पास लेबल डिजाइन करने और वेबसाइट बनाने का कोई एआई टूल नहीं था। फिर भी उन्होंने मसालों और अचार का ऐसा सफल कारोबार खड़ा किया, जिसने वित्तीय वर्ष 2024-25 में लगभग 1 करोड़ रुपए का कारोबार किया।किसान परिवार में जन्मी मनीषा ने कम उम्र में ही पिता को खो दिया था। इसके बावजूद उन्होंने अच्छे-से पढ़ाई की और दसवीं तक की शिक्षा पूरी की। लेकिन सामाजिक अपेक्षाओं ने उनके लिए दूसरा रास्ता तय कर रखा था। वे अपनी महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ातीं, इससे पहले ही उनकी शादी हो गई और वे अपने होमटाउन से 322 किलोमीटर दूर पुरंदर चली गईं। नया जीवन 17 सदस्यों वाले एक संयुक्त परिवार में शुरू हुआ, जहां सभी वित्तीय फैसले परिवार के सबसे बड़े सदस्य लेते थे। चाहे 100 रुपए हों या 1 रुपया, हर खर्च के लिए अनुमति जरूरी थी। परिवार के युवा सदस्यों को बहुत कम आर्थिक स्वतंत्रता थी। मनीषा को सबसे ज्यादा दुख तब होता, जब वे अपने स्कूल जाने वाले तीन बच्चों को चॉकलेट या स्नैक्स खरीदने के थोड़े-से पैसे भी नहीं दे पाती थीं। इन्हीं पलों ने उनके भीतर आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल करने का संकल्प मजबूत कर दिया। चूंकि उन्होंने खुद कई अवसर छूटते देखे थे, इसलिए वे चाहती थीं कि उनकी दो बेटियों और बेटे के पास जीवन में बेहतर विकल्प हों। अनेक ग्रामीण परिवारों की तरह उनका परिवार भी मानसून से पहले सालभर के मसाले तैयार करता था। मनीषा में मसाले मिलाने की स्वाभाविक प्रतिभा थी और उनके मसाले खास स्वाद के चलते लोकप्रिय होने लगे। शुरुआत में ग्रामीण महिलाएं उन्हें कच्चा माल देती थीं और वे मसाले पीसने व मिलाने के बदले प्रति किलोग्राम 30 रुपए कमाने लगीं। उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट तब आया, जब एक राष्ट्रीयकृत बैंक ने 35 महिलाओं के लिए मसाला उत्पादन प्रशिक्षण आयोजित किया। मनीषा ने इसमें हिस्सा लेकर बिजनेस की बुनियादी बातें सीखीं और गांव में अपने उत्पाद बेचने लगीं। उनका सफर आसान नहीं था। परिजन और पड़ोसी खेती और घरेलू जिम्मेदारियों के बजाय बिजनेस में समय देने के उनके फैसले पर सवाल उठाने लगे। कई लोगों ने उनके विफल होने की भविष्यवाणी तक कर दी। लेकिन उन्होंने बहस न करने का निर्णय किया। दिन में वे बहू की जिम्मेदारियां निभातीं और रात में अचार-मसाले बनाती थीं। उन्हें असली सफलता तब मिली, जब उन्होंने महाराष्ट्र राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के उमेद अभियान के तहत एक महिला स्वयं सहायता समूह जॉइन किया। इस समूह के जरिए उन्होंने छोटा-सा ऋण लिया, उपकरण खरीदे और स्थानीय मेलों में उत्पाद बेचने लगीं। इसका उत्साहजनक रेस्पॉन्स मिला। मांग बढ़ी तो उन्होंने और ऋण लिए, कारोबार बढ़ाया और 20 महिलाओं को रोजगार दिया। आज उनका उद्यम हर आठ दिन में 2 टन अचार और 200 किलो मसाले बनाता है। बिजनेस पूर्णत: पंजीकृत है, खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन करता है और उनके पास सभी जरूरी प्रमाणपत्र हैं। हालांकि, सबसे संतोषजनक उपलब्धि कारोबार के आंकड़े नहीं हैं। उनकी दोनों बेटियां अब ग्रेजुएट हैं और बेटा 11वीं में पढ़ रहा है। वे खुद के लिए जो आर्थिक आजादी तलाश रही थीं, वही उनकी भावी पीढ़ी के लिए शिक्षा के अवसरों में बदल गई। फंडा यह है कि एक बेटी को शिक्षित कीजिए तो वह न सिर्फ खुद का जीवन स्तर ऊपर उठाती है, बल्कि पूरे परिवार के लिए अधिक शिक्षित, आत्मविश्वास से भरा और आर्थिक रूप से सुरक्षित भविष्य भी तैयार करती है।