एन. रघुरामन का कॉलम:सुविधाओं के आदी लोगों के लिए ‘फ्रिक्शन मैक्सिंग’ करना मुश्किल है!
अधिक उम्र के कई लोगों को याद होगा कि उस दौर की गर्मियों में टेबल फैन ही हवा का एकमात्र साधन हुआ करता था। मेरे बचपन में हमारे घर में उषा कंपनी का एक फैन था, जो दाईं ओर घूमते हुए कमरे के उस छोर तक हवा देता था, जहां मेरे पिता सो रहे होते थे। फिर वह बाईं ओर घूमकर मेरी तरफ आने में समय लगाता था। मुझे पक्का विश्वास था कि चूंकि पिता परिवार के मुखिया थे, इसलिए फैन भी जानता था कि उन्हें ही ज्यादा हवा देना है। जबकि वह मुझे उससे वंचित रखता था क्योंकि परिवार की हायरेर्की में मेरी कोई खास अहमियत थी ही नहीं। इसलिए मैंने पिता से हमारी जगहें बदलने का अनुरोध किया। लेकिन पंखा भी चालाक था। इस बार वह बाईं ओर धीमा हो गया और दाईं ओर आने में समय लेने लगा। कभी-कभी मैं सोने के बजाय टेबल फैन के घूमने के साथ-साथ चलता रहता था और मां-पिता तक पहुंचने वाली हवा को रोक देता था। वे कहते थे, कितनी देर ऐसे ही चलते रहोगे? आओ और सो जाओ। उन्हीं दिनों में पिता ने मुझे सलाह दी थी- “असुविधा को सहने की क्षमता विकसित करो, यह जीवन में तुम्हारी मदद करेगी।’ लेकिन उस समय मैंने उनकी इस हिदायत पर ध्यान नहीं दिया था। फिर मैं बड़ा हुआ। मेरा सौभाग्य था कि 18 वर्ष की उम्र में ही मुंबई में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी रोश प्रोडक्ट्स के साथ कामकाजी जीवन की शुरुआत करने का मुझे अवसर मिल गया। दुनिया में जानी-मानी फार्मा कंपनी के वातानुकूलित माहौल में बैठकर काम करते हुए मुझे दो बातें याद आती थीं- एक, पिता की दी हुई सलाह और दूसरी, नागपुर रेलवे स्टेशन के आरक्षण कार्यालय में उनका दफ्तर, जो गर्म, शोरगुल भरा, हमेशा भीड़ से खचाखच रहता था और जहां हर कर्मचारी रूमाल से अपना पसीना पोंछता रहता था। अपने एसी वर्कप्लेस से बाहर निकलने के बाद मुझे बॉम्बे (अब मुंबई) की लोकल ट्रेन में सफर करना नापसंद था। उन दिनों एसी लोकल ट्रेन नहीं हुआ करती थीं। जब मैंने सामान्य लोकल ट्रेन में ही पहले दर्जे का सीजन टिकट खरीदने का फैसला किया, तो मेरे पिता ने फिर वही समझाइश दोहराई- “असुविधा को सहने की क्षमता विकसित करो…’ और मैंने फिर उनकी बात को अनसुना कर दिया। कुछ सालों बाद जब मेरी बेटी इस दुनिया में आई, तो मैंने 1991 में अपने घर में यह कहते हुए विंडो एसी लगवाया कि बच्ची को आराम की जरूरत है। लेकिन मेरे पिता गर्मियों में भी हमेशा अपनी पोती को उस कमरे से बाहर ले जाते और कहते- “बच्चों को थोड़ा असुविधाजनक माहौल में भी बड़ा होना चाहिए।’ मैंने फिर उनकी बात को नजरअंदाज कर दिया। मैं सोचता था मैं अपनी बच्ची को उससे कहीं ज्यादा कम्फर्ट दे सकता हूं, जितना वे अपने बच्चे को दे पाए थे। वर्षों बाद मुझे इस बात का तब एहसास हुआ कि पिता की वो समझाइशें कितनी दूरदर्शी थीं, जब मैंने एक ऐसी पीढ़ी को देखा, जो छोटी-छोटी बातों पर निराशा और गुस्से की शिकार हो रही है। कारण, ज्यादातर पैरेंट्स ने वही किया जो मैंने किया था। जब “राजा बेटा’ बचपन से ही तमाम तरह की सुविधाएं पाता है, तो बड़ा होकर आक्रामक बन जाता है। पिछले सप्ताह एक मित्र के बेटे ने कांच की खिड़की पर मुक्का मार दिया, क्योंकि उसकी मां बाजार से तय समय पर नहीं लौटीं और घर का मुख्य दरवाजा नहीं खोला। मित्र ने मुझसे अनुरोध किया कि मैं तुरंत पहुंचकर उसके बेटे को अस्पताल ले जाऊं। वह फ्रिक्शन मैक्सिंग नहीं कर पाया था। फ्रिक्शन मैक्सिंग का अर्थ है- रोजमर्रा की आदतों में जानबूझकर छोटे-छोटे अवरोध या प्रतिरोध जोड़ना, ताकि तकनीकी-आधारित सुविधाभोगिता के खिलाफ खुद को तैयार किया जा सके। जैसे छपी किताब पढ़ना, जीपीएस के बिना गाड़ी चलाना या मूलभूत चीजों से खाना पकाना (न कि रेडी टु ईट से)- ताकि एकाग्रता, सहनशीलता और उपलब्धि का एहसास विकसित हो। यह स्क्रीन से होने वाली थकान, तुरंत संतुष्टि पाने की आदत और मानसिक थकावट का एंटीडोट है। किसी कठिन या धीमी प्रक्रिया वाली चीज को जानबूझकर धैर्य के साथ करने की असुविधा को स्वीकार करके व्यक्ति वास्तविकता से दोबारा जुड़ता है, जिससे वह कम निराश और हताश होता है। फंडा यह है कि अपने बच्चों को रोजमर्रा के जीवन में कुछ असुविधाओं को स्वीकार करना भी सिखाएं, आसान रास्तों को हमेशा चुनने से बचें और उनमें असुविधा सहने की क्षमता विकसित करें। यकीन मानिए, इससे उन्हें अनिश्चितताओं का मुस्कराते हुए सामना करने में मदद मिलेगी।