एन. रघुरामन का कॉलम:स्मार्ट बोर्ड शिक्षण संस्थानों में ब्लैक बोर्ड जैसे क्यों बनते जा रहे हैं?

Jul 28, 2026 - 12:15
एन. रघुरामन का कॉलम:स्मार्ट बोर्ड शिक्षण संस्थानों में ब्लैक बोर्ड जैसे क्यों बनते जा रहे हैं?
हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां नॉलेज महज एक क्लिक पर उपलब्ध हो सकता है। कोई इंस्पायर्ड टीचर दुनिया के ऐसे बेहतरीन आइडिया, वीडियो और इलस्ट्रेशन तत्काल क्लासरूम में दिखा सकता है, जिन पर स्टूडेंट अचम्भित रह जाएं। इसीलिए यह हैरत की बात नहीं कि बीते एक दशक में शैक्षणिक संस्थानों- अधिकतर निजी स्कूलों और अब सरकारी स्कूलों ने स्मार्ट बोर्ड पर भारी निवेश किया है। तकनीक से उम्मीद थी कि यह टीचिंग को बदल देगी। ब्लैकबोर्ड पर लिखने में कीमती समय खपाने के बजाय टीचर सिर्फ अगली स्लाइड पर स्वाइप करके एनिमेशन या वीडियो दिखा सकेंगे और पूरी कक्षा को इंगेज रखेंगे। इससे अनुशासन भी बेहतर हुआ। चूंकि टीचर को बार-बार बोर्ड पर लिखने के लिए पीठ नहीं करनी पड़ती, इसलिए शरारती स्टूडेंट्स को भी डिस्ट्रैक्ट करने के कम मौके मिलते हैं। कुछ साल पहले मेरे द्वारा किए गए एक छोटे सर्वे में शिक्षकों ने बताया कि स्मार्ट बोर्ड से 50-60 मिनट की क्लास में 11 से 15 मिनट तक बच जाते हैं। स्कूलों को लगा कि अब क्लास में पूरा समय राइटिंग के बजाय टीचिंग में लगेगा। लेकिन दुर्भाग्य से यह उम्मीद अकसर एक पॉलिसी डॉक्यूमेंट तक सीमित रहती है। गोवा का उदाहरण लें। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यूडाइस) रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार गोवा उन चुनिंदा राज्यों और दिल्ली व चंडीगढ़ जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में शामिल है, जहां कथित तौर पर सभी 1473 स्कूलों में इंटरनेट कनेक्टिविटी है। लेकिन मीडिया रिपोर्ट कहती हैं कि कई स्कूलों में टीचर स्मार्ट बोर्ड को सामान्य ब्लैकबोर्ड की तरह इस्तेमाल करने को मजबूर हैं, क्योंकि इंटरनेट कनेक्टिविटी गैर-भरोसेमंद है या अनुपलब्ध होती है। टीचर कहते हैं कि सरकार तकनीक आधारित शिक्षा को बढ़ावा दे रही है, लेकिन अन-रिलायबल इंटरनेट और बार-बार बिजली जाने की वजह से वे बेबस हो जाते हैं। स्मार्ट बोर्ड वाली कक्षाएं उन्हीं घंटों में रखनी पड़ती हैं, जब बिजली और इंटरनेट उपलब्ध हों। मानसून में परेशानी और बढ़ जाती है। नतीजतन एजुकेशनल वीडियो और इंटरेक्टिव कंटेंट दिखा पाना नामुमकिन होता है, जबकि इसी पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में जोर दिया गया है। हालांकि इन्फ्रास्ट्रक्चर तो समस्या का महज एक हिस्सा है। कई स्कूल-कॉलेजों की विजिट में मैंने एक और चुनौती देखी। बहुत-से शिक्षक स्मार्ट बोर्ड के प्रभावी इस्तेमाल के लिए ट्रेंड नहीं हैं। मसलन, कुछ शिक्षक पूरे पावरपॉइंट प्रजेंटेशन से ही बाहर हो जाते हैं, ताकि खाली व्हाइट स्क्रीन पर कुछ पॉइंट लिख सकें। उन्हें पता ही नहीं कि वे सीधे प्रजेंटेशन पर ही अपनी टिप्पणी जोड़ सकते हैं। आधुनिक स्मार्ट बोर्डों में डिजिटल एनोटेशन, इंटरेक्टिव क्विज, लाइव वेब एक्सेस और इंस्टैंट कंटेंट शेयरिंग जैसे सैकड़ों फीचर होते हैं। लेकिन कई शिक्षक उनका उपयोग वैसे ही करते हैं, जैसे ब्लैकबोर्ड का किया करते थे। नतीजतन, एक महंगा डिजिटल क्लासरूम महज एक इलेक्ट्रॉनिक राइटिंग सर्फेस जैसा बनकर रह जाता है। शिक्षा सिर्फ तकनीक से ही बेहतर नहीं बनती। इसके लिए भरोसेमंद इन्फ्रास्ट्रक्चर, लगातार टीचर ट्रेनिंग और नए टीचिंग मैथड अपनाने की मंशा भी जरूरी है। वरना सर्वाधिक स्मार्ट बोर्ड भी ब्लैकबोर्ड बनकर रह जाएगा। यह देखकर भी दुख होता है कि कई टीचर स्मार्ट बोर्ड पर लिखने के लिए स्टाइलस की जगह बॉल पेन का ढक्कन इस्तेमाल करते हैं। महंगी एक्सेसरीज के साथ टीचर्स का ऐसा लापरवाही भरा रवैया परोक्ष तौर पर बच्चों को घर में पैरेंट्स द्वारा लाए गए उपकरणों के प्रति भी नकारात्मक व्यवहार अपनाने को प्रेरित करता है। टीचर्स को याद रखना चाहिए कि संस्थान द्वारा मुहैया कराए गए इन्फ्रास्ट्रक्चर के प्रति उनका सम्मान और बॉडी लैंग्वेज ही बच्चों को भी यह सिखाती है कि सरकारी सम्पत्ति का सम्मान कैसे करें। फंडा यह है कि स्मार्ट बोर्ड खरीदना और इन्स्टॉल करना तो पहला कदम है। जब तक संस्थान भरोसेमंद इंटरनेट, निर्बाध बिजली और नियमित टीचर ट्रेनिंग सुनिश्चित नहीं करेंगे, तब तक ये महंगे उपकरण वो इंगेजिंग, टाइम-सेविंग और विजुअली रिच लर्निंग एक्सपीरियंस नहीं दे पाएंगे, जिसके लिए इन्हें बनाया गया है।