कैरोलीन किस्साने का कॉलम:इस युद्ध ने तेल की मांग कम करने का सबक भी सिखाया
ईरान युद्ध को कई कारणों से याद रखा जा सकता है, लेकिन इसका एक परिणाम ऐसा है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। तेल आपूर्ति में आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी बाधा ने तेल की वैश्विक मांग कम करने को गति दे दी है। चार महीने पहले होर्मुज के प्रभावी रूप से बंद होने से वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा हो गया। तेल की कीमतों में तेज उछाल आया, व्यापार-प्रवाह बाधित हुआ, सरकारें उपभोक्ताओं को महंगाई से बचाने के लिए सक्रिय हुईं और कारोबारों को खुद को समायोजित करना पड़ा। लेकिन एक और रुझान भी उभरा। देशों ने कम तेल के साथ जीवन जीने के लिए खुद को ढालना शुरू कर दिया है। ऊर्जा क्षेत्र को अपनी सबसे महत्वपूर्ण धारणाओं में से एक पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा है कि वैश्विक तेल की मांग लगातार बढ़ती ही रहेगी। युद्ध से पहले, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने अनुमान लगाया था कि तेल की मांग 2024 से 2030 तक 2.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन बढ़ेगी और दशक के अंत तक लगभग 105.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन के स्तर पर पहुंचकर स्थिर हो जाएगी। बहस इस पर नहीं थी कि मांग बढ़ती रहेगी या नहीं, बल्कि इस पर थी कि वृद्धि कितनी तेजी से धीमी होगी। अब आईईए का अनुमान है कि 2026 में तेल की वैश्विक मांग युद्ध से पहले लगाए अनुमान से लगभग 1.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन कम होगी। इस गिरावट का कुछ हिस्सा कमजोर आर्थिक परिस्थितियों और ऊंची कीमतों को दर्शाता है, लेकिन शेष हिस्सा एडाप्टेशन है। सीमित आपूर्ति और अनिश्चितता का सामना करते हुए सरकारों और उद्योगों ने तेल पर निर्भरता कम करने के अपने प्रयासों को तेज कर दिया है। बाजारों ने भी उसी के अनुरूप प्रतिक्रिया दी है। हमलों की खबरों पर तेल की कीमतें बढ़ीं और कूटनीतिक वार्ताओं की खबरों पर गिरीं। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट कच्चे तेल की कीमत जून के पहले सप्ताह के अंत में 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रही, जबकि ब्रेंट क्रूड लगभग 93 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। हालांकि कीमतें युद्ध के दौरान दर्ज किए गए उच्चतम स्तर से नीचे आ गई हैं, फिर भी वे युद्ध-पूर्व स्तरों से अधिक बनी हुई हैं। युद्ध से पहले प्रतिदिन लगभग 125-140 जहाज होर्मुज से गुजरते थे। इस जलमार्ग को भरोसेमंद माना जाता था और लंबे समय तक किसी व्यवधान की संभावना को बेहद कम समझा जाता था। लेकिन होर्मुज बंद होने ने सरकारों तथा कंपनियों को ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी धारणाओं पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। अब भले ही यातायात फिर से शुरू हो जाए और होर्मुज से बारूदी सुरंगों को भी हटा दिया जाए, लेकिन पिछले चार महीनों के अनुभव को बदला नहीं जा सकता। युद्ध से पहले चीन लगभग 1.1 करोड़ बैरल तेल प्रतिदिन आयात कर रहा था। इसके बाद से उसने अपने भंडारों का उपयोग करते हुए, रिफाइनरी संचालन में बदलाव करते हुए, कुछ पेट्रोकेमिकल कच्चे माल के लिए कोयले का विकल्प अपनाकर आयात में भारी कमी की है। कई विश्लेषकों के अनुसार, चीन की आयात कम करने की क्षमता उन प्रमुख कारणों में से एक रही है, जिनकी वजह से तेल की कीमतें उतनी ऊंचाई तक नहीं पहुंचीं, जितनी आशंका जताई जा रही थी। ध्यान रहे कि पिछले एक दशक में तेल की वैश्विक मांग-वृद्धि का सबसे बड़ा कारण भी चीन ही रहा है। 2015 से 2024 के बीच चीन की तेल मांग में लगभग 60 लाख बैरल प्रतिदिन की वृद्धि हुई, जो वैश्विक मांग वृद्धि का लगभग 60% थी। और केवल चीन ही ऐसा नहीं कर रहा है। एशिया और दुनिया के अन्य हिस्सों की सरकारों ने भी तेजी से ऐसे कदम अपनाए हैं। चार दिन का कार्य-सप्ताह, घर से काम करने की नीतियां, एयर कंडीशनिंग पर प्रतिबंध, औद्योगिक राशनिंग, आपातकालीन सब्सिडी, करों में कटौती और कृषि इनपुट के लिए प्रत्यक्ष सहायता- ये सभी अब नीतिगत औजारों का हिस्सा बन गए हैं। दुनिया के देशों ने कम तेल के साथ जीने के लिए खुद को ढालना शुरू कर दिया है। ऊर्जा क्षेत्र को अपनी सबसे महत्वपूर्ण धारणाओं में से एक पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा है कि तेल की मांग लगातार बढ़ती रहेगी। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)