डॉ. राम चरण का कॉलम:मुश्किल समय में ही होती है वास्तविक लीडर की पहचान
दुनिया इस समय ऐसे भू-राजनीतिक संकट से गुजर रही है, जैसा अधिकांश लीडर्स ने अपने पूरे करियर में कभी नहीं देखा था। ट्रेड वॉर। आपूर्ति शृंखला को लग रहे झटके। ऐसे टैरिफ जो रातोंरात लागू हो जाते हैं। ऐसे बाजार जिनमें एक ही हेडलाइन पर उथलपुथल मच जाती है। ऐसी कंपनियां जो महज छह महीने पहले तक फल-फूल रही थीं, पर जो अब नए आपूर्तिकर्ताओं, नए बाजारों और नई जमीन तलाशने के लिए जूझ रही हैं। इस माहौल में एक लीडर जो सबसे महत्वपूर्ण चीज कर सकता है, वह रणनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय है।
आपके लोग आपको देख रहे हैं। हर दिन। वे सुबह की बैठक में आपके चेहरे को पढ़ रहे हैं। वे सुन रहे हैं कि आप क्या कहते हैं और क्या नहीं कहते। वे आपके व्यवहार के आधार पर तय कर रहे हैं कि इसी नौकरी में बने रहना है या चुपचाप कहीं और काम की तलाश शुरू कर देनी है। अनिश्चितता से भरे समय में प्रतिभाएं बाजार नहीं, लीडर की वजह से जॉब छोड़ जाती हैं। मैंने यह पैटर्न बीते छह दशकों में, हर उद्योग और हर क्षेत्र की कंपनियों के साथ काम करते हुए, बार-बार दोहराते हुए देखा है। वे लीडर जो ऊहापोह से भरे समय में भी टीमों को जोड़े रखते हैं, वे सबसे बेहतर रणनीति वाले नहीं होते। वे वो होते हैं जो सच बोलते हैं, लगातार अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं, और अपने लोगों को यह महसूस कराते रहते हैं कि वे इस दौर में उनके साथ हैं। व्यवहार में यह ऐसे अमल में लाया जाता है :
पहली चीज है पारदर्शिता। वह सजी-संवरी पारदर्शिता नहीं, जो ऊपर से यह दिखाती हो कि सब ठीक है जबकि हकीकत इससे उलट हो। असली पारदर्शिता। जब अनिश्चितता हो, तो उसे स्वीकारें। जब आपके पास उत्तर न हो, तो वैसा कहें। आपके कर्मचारी पहले से जानते हैं कि हालात कठिन हैं। उन्हें आपसे जो चाहिए, वो है इसे स्वीकार करने की ईमानदारी और इसके बावजूद आगे बढ़ते रहने की स्थिरता। जो लीडर खुलकर संवाद करता है, वह भरोसा बनाता है। जो कठिनाइयों को छिपाता है, वह भरोसा तोड़ता है। दूसरी चीज है फोकस। मुश्किल समय में हर चीज पर प्रतिक्रिया देने का प्रलोभन होता है। इससे बचें। अपनी टीम को स्पष्ट, हासिल किए जा सकने वाले लक्ष्य दें, जो उनके नियंत्रण में हों। भू-राजनीतिक स्थिति उनके नियंत्रण में नहीं है। वे क्या बनाते हैं, अपने ग्राहकों की सेवा कैसे करते हैं, मिलकर कैसे काम करते हैं- यह उनके नियंत्रण में है। उनकी ऊर्जा को वहीं केंद्रित करें। मोमेंटम से आत्मविश्वास बनता है और आत्मविश्वास ही मनोबल बढ़ाता है। तीसरी चीज है लोगों में निवेश। यही वह समय होता है जब कंपनियां प्रशिक्षण और विकास के बजट में कटौती करती हैं। यह खराब निर्णय है। जब आप कठिन दौर में भी अपने लोगों में निवेश करते हैं, तो यह संकेत देते हैं कि हमें आपके भविष्य पर विश्वास है। यह किसी भी रिटेंशन बोनस से अधिक मूल्यवान है। लोग वहीं टिकते हैं, जहां उन्हें लगता है कि वे आगे बढ़ रहे हैं। चौथी चीज है संस्कृति। सकारात्मक कार्य-संस्कृति अच्छे समय की लग्जरी भर नहीं है। यह वो बुनियादी ढांचा है, जो कठिन समय में संगठन को एकजुट रखता है। जो लीडर अपने लोगों के लिए वास्तविक सम्मान, पहचान और देखभाल का वातावरण बनाते हैं, वे पाते हैं कि उनके पास सबसे निष्ठावान, उत्पादक और लचीली वर्कफोर्स है। कल्चर आसान क्षणों में नहीं बनती है। पांचवीं चीज है मान्यता। किसी को यह बताने के लिए वार्षिक समीक्षा का इंतजार न करें कि वह बहुत अच्छा काम कर रहा है। यह अभी करें। जो व्यक्ति खुद को मूल्यवान महसूस करता है, वह बाहर निकलने के बारे में नहीं सोचता। वह और अधिक योगदान देने के रास्ते तलाशता है। इनमें से कुछ भी जटिल नहीं है। लेकिन इन सबके लिए अनुशासन चाहिए। भू-राजनीतिक संकट जल्दी समाप्त होने वाला नहीं है। जो लीडर इससे मजबूत टीमों, संस्कृतियों और व्यवसायों के साथ उभरेंगे, वे वही होंगे जिन्होंने इस दौर को केवल झेलने योग्य संकट नहीं, बल्कि यह दिखाने के अवसर के रूप में लिया कि लीडरशिप का वास्तविक अर्थ क्या है। आपके लोग याद रखेंगे कि आपने कठिन समय में उनके साथ कैसा व्यवहार किया। सुनिश्चित करें कि वे इसे अच्छे रूप में याद रखें। भू-राजनीतिक संकट जल्दी समाप्त होने वाला नहीं है। जो लीडर इससे मजबूत टीमों, संस्कृतियों और व्यवसायों के साथ उभरेंगे, वे वही होंगे जिन्होंने इस दौर को यह दिखाने के मौके के रूप में लिया कि लीडरशिप के मायने क्या हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)