संजय कुमार का कॉलम:सीटों के बजाय वोट-शेयर का पूर्वानुमान ज्यादा महत्वपूर्ण है
29 अप्रैल की शाम को असम, तमिलनाडु, केरल, बंगाल तथा पुडुचेरी के लिए जारी किए गए एग्जिट पोल कई नेताओं और दलों के लिए सुकून का कारण नहीं बन सके। कारण, कम से कम दो राज्यों- तमिलनाडु और बंगाल के लिए एग्जिट पोल के अनुमान एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं। लेकिन असम व केरल में लगभग सभी एजेंसियों के बीच इस बात पर व्यापक सहमति दिखाई देती है कि कौन-सा दल या गठबंधन जीत रहा है। अधिकांश एग्जिट पोल असम में भाजपा-नेतृत्व वाले गठबंधन को निर्णायक बढ़त देते हैं, जबकि केरल में कांग्रेस-नेतृत्व वाले यूडीएफ की जीत का संकेत मिलता है। लेकिन बंगाल और तमिलनाडु में परिणाम को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। कुछ एजेंसियों ने तो बंगाल के लिए एग्जिट पोल का अनुमान जारी करने को टालना तक उचित समझा है, क्योंकि वहां मतदान का दूसरा चरण 29 अप्रैल को ही समाप्त हुआ था और वे आंकड़ों को बेहतर ढंग से समझने के लिए थोड़ा समय लेना चाहते हैं। इसे मैं एक विवेकपूर्ण निर्णय कहूंगा, क्योंकि कई बार मतदान आधिकारिक समय समाप्त होने तक भी लंबी कतारों के कारण जारी रहता है। हालांकि यह भी याद रखना चाहिए कि एक दिन और रुक जाना इस बात की कोई गारंटी नहीं देता कि सीटों का अनुमान अधिक सटीक हो जाएगा। आखिरकार तमिलनाडु में तो मतदान 23 अप्रैल को ही समाप्त हो गया था और एजेंसियों के पास आंकड़ों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त समय था, फिर भी विभिन्न एजेंसियों के अनुमान वहां भी एक-दूसरे से भिन्न हैं। असम और केरल के लिए लगभग सभी एग्जिट पोल एक ही दिशा में संकेत दे रहे हैं, लेकिन इसका यह कारण नहीं है कि एजेंसियों को डेटा संग्रह और विश्लेषण के लिए असाधारण रूप से अधिक समय मिला था। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं- जैसे अपेक्षाकृत कम राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, सत्तारूढ़ दल या गठबंधन के सामने विपक्ष द्वारा पेश की गई चुनौती का स्वरूप, और अन्य फैक्टर्स। फिर भी, असम और केरल के एग्जिट पोल को सावधानी से पढ़ने की आवश्यकता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सभी एग्जिट पोल चूक गए थे; उन्होंने एनडीए के लिए 400 से अधिक सीटों का अनुमान लगाया था। इसी तरह, 2024 के हरियाणा चुनाव में भी लगभग सभी एजेंसियों के बीच कांग्रेस की बड़ी जीत को लेकर सहमति थी। यही स्थिति 2023 के छत्तीसगढ़ चुनाव में भी देखने को मिली, जहां एग्जिट पोल द्वारा कांग्रेस की निश्चित जीत का अनुमान लगाया गया था। बिहार विधानसभा चुनाव में एग्जिट पोल की सफलता का रिकॉर्ड मिश्रित रहा। कई ने एनडीए की जीत का अनुमान लगाया था, लेकिन किसी ने भी इतनी बड़ी जीत की भविष्यवाणी नहीं की थी। तमिलनाडु में एग्जिट पोल के अनुमान कुछ जटिल प्रतीत होते हैं। जिन चार एग्जिट पोल पर मेरी नजर गई, उनमें से तीन ने डीएमके गठबंधन की जीत का अनुमान लगाया है, एआईएडीएमके गठबंधन को दूसरे स्थान पर और विजय के नेतृत्व वाली टीवीके को तीसरे स्थान पर रखा है, जबकि तमिलनाडु के संदर्भ में एक एग्जिट पोल अपवाद के रूप में सामने आता है। जिस राज्य ने सबसे अधिक लोगों की सांसें थाम रखी हैं, वह बंगाल है। वहां चुनाव अत्यंत कड़े मुकाबले में लड़े गए हैं। अब तक सार्वजनिक किए गए अधिकांश एग्जिट पोल बंगाल में भाजपा की जीत का अनुमान लगा रहे हैं, हालांकि यहां भी एक एग्जिट पोल ऐसा है जो इस प्रवृत्ति से अलग, एक अपवाद के रूप में सामने आता है। इस समय यह कहना कठिन है कि ये अनुमान 4 मई को आने वाले वास्तविक परिणामों की तुलना में कितने सटीक साबित होंगे। लेकिन मेरा मानना है कि यदि चुनाव-विश्लेषक गलत साबित होते हैं, तो इसका कारण मुख्यतः वोट-शेयर के अनुमान में त्रुटि हो सकता है। वोट-प्रतिशत में मामूली बदलाव भी सीटों की संख्या में बड़ा अंतर पैदा कर सकता है। हमने ऐसे चुनाव देखे हैं, जहां किसी दल ने अपने प्रतिद्वंद्वी की तुलना में कम वोट-प्रतिशत होने के बावजूद अधिक सीटें जीत ली हैं। हमारी चुनावी व्यवस्था- फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली- में यह जटिलता और बढ़ जाती है। इसमें कोई उम्मीदवार एक वोट से जीते या एक लाख वोटों से, दोनों ही स्थितियों में उसे केवल एक सीट ही मिलती है। हालिया एग्जिट पोल्स ने विशेषकर तमिलनाडु और बंगाल के संदर्भ में यह बताने के बजाय कि वोट किस प्रकार पड़े होंगे, उलटे दुविधा और चिंता को और बढ़ाया है। इस बार एग्जिट पोल की संख्या भी अपेक्षाकृत कम है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)